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भारत के ग्रामीण खजाने की खोज

विकास मंत्र. भारत में बाजार का नया मंत्र है : गांवों में जाओ। शहरी बाजार के बढ़ने की गति धीमी पड़ रही है, जबकि प्रतिस्पर्धा लगातार बढ़ रही है। ऐसे में अपनी वृद्धि दर कायम रखने के लिए उत्पादों के सामने एक ही चारा है- चलो गांव की ओर। इसीलिए आने वाले दिनों में बाजार की भाषा ग्रामीण मुहावरों और रुझानों से भरी होगी। 1 अरब आबादी के देश भारत में 73 फीसदी लोग 5,72,000 गांवों में रहते हैं। इस विशाल संख्या में छिपी संभावना तो बाजार के होनहारों को दिखाई देती है, लेकिन इससे ज्यादा उसे नहीं पता, मिथों के अलावा। ये मिथ भारत के ग्रामीण बाजार को और भी रहस्यमय बना देते हैं। इसके विपरीत तथ्य और आंकड़े कम हैं। जो हैं भी, सरकारी तंत्र से आए हैं, इसलिए बाजार के लिए ज्यादा काम के नहीं हैं। यही असली चुनौती है।

नए विक्रेताओं को भारत के ग्रामीण बाजार की सचाई खुद खोजनी होगी। इस बाजार को समझने के लिए उन्हें खुद यात्रा पर निकलना होगा। इसकी विविधता उनके लिए सबसे कठिन चुनौती है - 5.72 लाख गांव, 33 भाषाएं, 1652 बोलियां, संस्कृतियां, उनकी उप-संस्कृतियां और अनगिनत जरूरतें। लेकिन इन रहस्यों के दूसरे छोर पर सचमुच एक खजाना छिपा है। इस लिहाज से ग्रामीण बाजार एक बड़ा अवसर है। सबसे पहले इस बाजार को समझने के लिए ही कंपनियों को खासा निवेश करना होगा।

ग्रामीण भारतीयों के खरीद और उपभोग के रवैये को जानने के लिए शोध व अध्ययन करने होंगे और बहसें चलानी होंगी। फिर ग्रामीण बाजार है क्या? शहरी बाजार कहां खत्म होता है और कहां ग्रामीण बाजार शुरू होता है? जो ऐसे अनेक प्रश्नों के उत्तर पहले हासिल कर लेगा, वही अगुवा कहलाएगा। कुछ अगुवाओं ने ग्रामीण बाजार को टटोलना शुरू भी कर दिया है। पिछलग्गू तो खैर बहुत होंगे। जब वे दौड़ पड़ेंगे, तभी भारत के बेशकीमती ग्रामीण खजाने की खोज शुरू होगी।

-लेखक प्रख्यात मैनेजमेंट कंसल्टेंट हैं।





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