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चिंताजनक है भाषा में आक्रामकता

दृष्टिकोण. नि:संदेह हमारा आसपास, हवा-पानी, खाना-पीना, जीना-रहना, बोलना-सोचना, किसी न किसी स्तर पर प्रदूषण का अनवरत शिकार हो रहा है। हमारे जीवन को प्रदूषित करने वाले जिन कारकों की अकसर चर्चा की जाती है, उनमें भाषा की प्राय: अनदेखी हो रही है। रिश्तों, मूल्यों, यहां तक कि हमारी अभिव्यक्ति तक पर आक्रामकता और हिंसा ने अपना शिकंजा कस लिया है।

अभिव्यक्ति के स्तर पर बढ़ रही आक्रामकता और हिंसा अनेक रूपों में व्यक्ति और समाज को विकृत कर रही हैं। ये विकृतियां मारधाड़, तोड़फोड़, दंगों-आगजनी, आक्रमणों-युद्धों के रूप में तो सामाजिक ताने-बाने और राष्ट्रीय विकास को नुकसान पहुंचा ही रही हैं, वाणी और संवाद के माध्यमों को भी उनके मूल मंतव्यों, लक्ष्यों, साधनों, रास्तों, सिद्धांतों से भटका रही हैं।

समाज व राष्ट्र की मजबूती और विकास के लिए जरूरी है कि इस प्रवृत्ति को बढ़ावा दे रही शक्तियों के छिपे मंसूबों और गुपचुप प्रयासों को आमजन के सामने लाया जाए। ऐसा नहीं है कि ऐसी प्रवृत्तियों का विरोध कर सकने वाले समाज में कम हैं, पर जब आम जन बड़े पदों और संस्थानों के स्वामियों को ऐसी प्रवृत्तियों की हरकतों-करतूतों पर बच-संभलकर, चालाक, अवसरवादी ढंग से प्रतिक्रिया व्यक्त करते देखता है, तो वह दुखी होता है और उसके ओंठ खुलना चाहकर भी खुल नहीं पाते।

वाणी और संवाद के स्तर पर बढ़ते प्रदूषण को हम आस-पड़ोस, गली-मोहल्लों, कार्यस्थलों व सार्वजनिक स्थलों पर रोज-रोज-सुनते-सोचते ही हैं। संसद, विधानसभाओं व बड़े प्रशासनिक पदों पर आसीन लोगों की अभिव्यक्ति के जरिए भी हम इससे रू-ब-रू होते रहते हैं। गांव हो या शहर, आदमी की रोजमर्रा की बातचीत में गालियों का प्रयोग इस तरह और इतना बढ़ गया है कि बोलने-सुनने वाले को अहसास भी नहीं होता कि वे अभद्रता की किस सीमा तक जा पहुंचे हैं।

अनपढ़ देहातियों की बात न भी करें तो अब उच्च शिक्षितों व उच्च पदस्थों की भाषा में भी बेहद चौंकाऊ और कानों में चुभने वाला बदलाव आ चुका है। जिस जल्दबाजी, लापरवाही और होड़ में संचार माध्यमों की भाष में बदलाव आया है वह चिंताजनक और भयप्रद है। चिंताजनक इसलिए कि हिंदी की समस्त ग्रहणशीलता, उदारता व जज्ब करने की अपार शक्ति के बावजूद उसके शब्दों के संस्कार, शील, अर्थ गांभीर्य और अन्य सौंदर्य तथा उनकी पवित्रता की रक्षा का भाव संचार माध्यमों में निरंतर घट रहा है।

वर्तनी, व्याकरण, शब्द- अर्थ के औचित्य आदि के प्रति बढ़ती जा रही उदासीनता और भाषा को अधिकतम आक्रामक, हिंसक, उत्तेजक, रहस्य-रोमांचपूर्ण दिखाने-बनाने की होड़ में अपनी अभिव्यक्ति को हिंग्लिश बताकर अपनी खामियों को विशिष्टता सिद्ध करने की उनकी तरह-तरह की कोशिशों को देखकर डर लगता है। पिछले कुछ महीनों की घटनाओं और समाचारों की अभिव्यक्ति पर नजर डालते ही स्थिति एकदम स्पष्ट हो सकेगी।

आम चुनावों के माहौल और भाषा को छोड़कर आप इस बार के राष्ट्रपति पद के चुनाव के पहले के दौर को याद करें। राजनीतिक दलों और नेताओं ने जिन विषयों-प्रसंगों का जिस भाषा में उपयोग किया था वह स्वीकार्य और मर्यादित तो नहीं ही था। अनेक बार कई मुख्यमंत्रियों और राज्यपालों के बीच सार्वजनिक रूप से अशोभनीय शब्दों और अंदाजों का उपयोग हुआ। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री और एम्स के डायरेक्टर के प्रसंग में, भारत-ऑस्ट्रेलिया के हाल के क्रिकेट मैचों में साइमंड्स-हरभजन, हेडन-इशांत के आपसी विवाद के मुद्दे पर या विपक्षी पार्टियों के मुख्यमंत्रियों तथा केंद्र सरकार के आपसी आरोपों-प्रत्यारोपों की भाष के संदर्भ में वाणी और विचार के स्तर के प्रदूषण को साफ-साफ सुना-देखा जा सकता है।

इन संबंधित व्यक्तियों, संगठनों या संस्थानों का उनकी भाषा की आक्रामकता और हिंसा के समाज पर पड़ने वाले दुष्प्रभाव से अनजान बने रहना उनकी अज्ञानता, रणनीति या षड्यंत्र विशेष का हिस्सा हो सकता है पर लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहे जाने वाले मीडिया की इस तरफ से की गई जरा सी भी अनदेखी समाज और राष्ट्र दोनों के हित में नहीं होगी।

किसे नहीं मालूम कि अखबारों ने एक नहीं कई पीढ़ियों को संस्कार दिए हैं, दिशा दी है। लोग शब्दों के सही अर्थ व प्रयोग और वर्तनी जानने के लिए समाचार पत्रों को किताबों-कोशों की तरह प्रामाणिक और विश्वसनीय मानते रहे हैं। बाजारवाद, विज्ञापन या रेटिंग आदि के नाम पर भी संचार-माध्यमों की भाष में तनिक असावधानी या होड़ के कारण होते थोड़े से भी क्षरण की स्थिति को देखकर आम और प्रबुद्धजनों का चिंतित-विचलित होना अकारण और अनावश्यक नहीं ठहराया जा सकता।

समाचार पत्रों की अपेक्षा अगर हम इलेक्ट्रॉनिक मीडिया-विशेषकर निजी चैनल्स की भाषा और उसके प्रस्तोताओं के लहजे और अंदाज को देखें, तो कई बार ऐसा लगने लगता है कि दर्शक कोई अपराधी है और बोलने-बताने वाला उस पर जैसे अपना पूरा गुस्सा निकाल लेना चाहता है या उससे सीधे दो-दो हाथ कर लेना चाहता है। माना कि मीडिया को सच बताना और दिखाना होता है। सच सामने लाना उसका धर्म है, पर उसके साथ सच को बताने-कहने के तरीके पर भी तो उसे ध्यान देना होगा।

समाचारों के शीर्षक, उनकी भाष तब बेहद आहत करती है जब हम वहां ऐसा कुछ लिखते-बोलते देखते हैं। उदाहरण हैं- अमुक ने अमुक की ऐसी-तैसी की.., उसने उसे धूल चटाई.,. उसने कचूमर निकाला.. बतीस्ता की खोपड़ी का तरबूज बनाना.. इन शीर्षकों में सिर्फ आक्रामकता और हिंसा ही नहीं दिख रही बल्कि हमारे आज के समाज के अवचेतन में छिपी-दबी आदिम वृत्तियों और पशुता का विस्फोटक दबाव भी साफ-साफ दिख रहा है।

शब्द को ब्रrा कहा गया है। वह सर्जक है, स्रष्टा है। शब्द का उपयोग हमारी संस्कृति, सभ्यता, प्रकृति, प्रवृत्ति, हमारे आचरण सबको व्यक्त भी करता है और संस्कारित भी। आज के संचार माध्यमों को भाष की अभद्रता और अपवित्रता को लेकर अधिकाधिक सजग व सावधान रहना होगा कि कल का भविष्य उनकी भाषा को अपने जीवन में उतार रहा है। कल वह उसी के सहारे सृजन भी करेगा और खुद को व्यक्त व संसार से संपर्कित-संवादित भी करेगा।

-लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं।





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