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Chandigarh Chandigarh चंडीगढ़. हरियाणा में मानवाधिकार आयोग क्यों जरूरी है, यह शायद खुद राज्य सरकार को भी नहीं मालूम। तभी तो सरकार ने फिर हाईकोर्ट में राज्य में मानवाधिकार आयोग की जरूरत को खारिज करते हुए कहा है कि हमने पुलिस को मानवाधिकार हनन के मामले देखने की जिम्मेदारी दी हुई है।
यहां तक कि सरकार कहती है मानवाधिकार के मामले उसके द्वारा जिला स्तर पर गठित शिकायत निवारण और अन्य मॉनिटरिंग कमेटियां देखती हैं, भले ही ऐसी कमेटियों की मीटिंग दो महीने या महीने में एक दफा होती हो। इससे पहले 1 नवंबर 2007 को हाईकोर्ट ने राज्य सकरार से पूछा था कि बताएं आपके पास ऐसा क्या मैकेनिज्म है जिससे कि राज्य में मानवाधिकार आयोग की जरूरत नहीं है।
हाईकोर्ट को मैकेनिज्म की जानकारी राज्य के गृह विभाग ने एक एफिडेविट के माध्यम से दी है। इसमें सरकार का कहना है कि हमने विस्तारपूर्वक राज्य में मानवाधिकार आयोग के गठन के बारे में विचार किया और फैसला लिया है कि राज्य में आयोग के गठन की कोई जरूरत नहीं है।
पुलिस देख रही हनन की शिकायतें : राज्य सरकार का कहना है कि हमने राज्य में मानवाधिकारों की रक्षा की जिम्मेदारी हरियाणा पुलिस के हवाले की हुई है, इसके लिए राज्य पुलिस हैड क्वार्टर्स में एक विशेष सैल का गठन किया गया है। यह सैल आईजी रैंक के एक अधिकारी की देखरेख में मानवाधिकार हनन की शिकायतें देख रहा है।
जिला शिकायत निवारण कमेटी : राज्य के जिला स्तर पर गठित इन कमेटियों की सरपरस्ती कैबिनेट मिनिस्टर के हाथों होती है। इस कमेटी की मीटिंग महीने में एक दफा ही होती है।
जिला स्तरीय मॉनिटरिंग कमेटी : सेशन जजों की अध्यक्षता में बनी इस कमेटी की जिम्मेदारी जिला स्तर पर लंबित केसों के तुरंत निपटारे की होती है। इसके अलावा यह कमेटी जेलों की व्यवस्था का भी जायजा लेती है।
अपराध, महिला एवं कमजोर वर्ग की मॉनिटरिंग : इन वर्र्गो की समस्याओं के लिए भी जिला स्तर पर कमेटियां बनी हुई हैं। इसमें डीसी, एसपी और डिस्ट्रिक्ट अटॉर्नी जिले में अपराध महिलाओं और कमजोर वर्र्गो को आने वाली समस्याओं की मोनिटरिंग करते हैं।
इसकी मीटिंग दो महीने में एक दफा होती है। इसके अलावा राज्य में मानवाधिकार आयोग के गठन को सिरे से नकारते हुए राज्य सरकार ने कहा कि ह्यूमन राइट कमीशन एक्ट के सेक्शन 21 के तहत हरियाणा सरकार मानवाधिकार आयोग के गठन करने को बाध्य नहीं है।
पुलिस क्या इंसाफ करेगी, सबसे ज्यादा हुयमन राईटस की वायॅलेशन तो पुलिस ही करती है। दूसरा जिला स्तर की ये कमेटियां तो सरकार की ही होती हैं, ये लोग खुद अधिकारों का हनन करते हैं, तो फिर न्याय कैसे हो सकता है।
—जस्टिस अजीत सिंह बैंस (रिटायर्ड) ह्यूमन राइट एक्टिविस्ट
सरकार द्वारा सुझाया यह मैकेनिज्म हयुमन राईटस कमीशन की जगह कैसे ले सकता है। सरकार की यह व्यवस्था एक छलावा है।
—रोशन लाल बत्ता, सीनियर एडवोकेट पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट