लंदन.पीठ दर्द दिमाग की उपज हो सकता है। इतना ही नहीं, अगर आपका कोई करीबी दोस्त, ऑफिस का सहयोगी या रिश्तेदार इस समस्या के बारे में बता रहा हो, तो उसे सुनने का असर भी आप पर हो सकता है। जी हां, एक ताजा स्टडी में इस बात का खुलासा हुआ है। जर्मनी के रिसर्चरों ने पता लगाया है कि इस समस्या के बारे में पढ़ने या करीबी लोगों में इसके बारे में सुनने पर भी लोग बैक पेन के शिकार हो जाते हैं।
अखबार डेली मेल ने इस बारे में एक रिपोर्ट प्रकाशित की। इसमें रिसर्चरों ने कहा है- ऐसी सूरत में दरअसल दिमाग यह सोचना शुरू कर देता है कि शरीर में दर्द है। शरीर में किसी तरह का जख्म या कोई और परेशानी न हो, तब भी दिमाग दर्द महसूस करने लगता है। 1990 में पूर्वी और पश्चिमी जर्मनी के एकीकरण के बाद वहां के लोगों की स्वास्थ्य की समस्याओं पर स्टडी के बाद रिसर्चर इस नतीजे पर पहुंचे।
रिसर्चरों का दावा है कि बैक पेन के करीब 15 फीसदी मामलों में ही शारीरिक गड़बड़ी का योगदान होता है। मसलन नर्व दब जाना या स्लिप डिस्क होना। दूसरे ज्यादातर मामलों में कोई शारीरिक गड़बड़ी नहीं पाई गई। इस बारे में रिसर्च रिपोर्ट 'इंटरनैशनल जर्नल ऑफ एपिडीमियॉलजी' में प्रकाशित हुई है। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक- पश्चिम जर्मनी में तेज बैक पेन की समस्या काफी आम है और इसकी वजह लोगों का पहनाव और रहन-सहन है। बैक पेन को काम करने में असमर्थ होने की बड़ी वजह बताया गया है। रिसर्चरों की मानें तो एकीकरण के बाद पश्चिम जर्मनी में बैक पेन के बारे में मौजूद तमाम मिथ और गलत धारणाएं पूर्वी जर्मनी में आ गईं और लोग इसके शिकार होने लगे। अखबार डेली मेल ने मंगलवार को इस बारे में एक रिपोर्ट प्रकाशित की।