bhaskar Web English
HomeManoranjanCinemaInterviews Interviews

'छोटे आदमी की बड़ी फिल्म'

मुंबई. मौका था मुंबई में 10वें अंतरराष्ट्रीय फिल्म उत्सव के समापन का और भारतीय प्रतिस्पर्धा में 10 फिल्मों में से सर्वश्रेष्ठ फिल्म चुनी गई मराठी भाषा की तिंग्या। इसे आलोचकों की पसंद का भी पुरस्कार मिला। किसानों की समस्याओं और आत्महत्या तक के हालात को निरूपित करने वाली इस फिल्म तिंग्या के निर्देशक मंगेश हडावले ने विशेष रूप से बातचीत की।

पहली फिल्म और इतनी शोहरत, इतने पुरस्कार, कैसा लगता है?
वाकई आप एक फिल्म बनाकर इस दुनिया में प्रवेश करें और इतना नवाजा जाए तो खास तो होता ही है। तिंग्या को पहले भी उत्सवों में पुरस्कृत किया जा चुका है, ढेर सारी तारीफ मिली है।

तो इस पुरस्कार का मोल क्या है?
यह पुरस्कार मेरे लिए खास है। इसकी वजह यह है कि कुछ समय पहले तक मैं जिस फिल्म फेस्टिवल में पास पाने के लिए संघर्ष करता था आज उसी अंतरराष्ट्रीय फिल्म उत्सव में मेरी पहली फिल्म को इतना प्यार मिला है, सम्मान मिला है। यह मेरे लिए सच में परम संतोष की बात है। दूसरा मैं मानता हूं कि इस पुरस्कार से साबित हो गया है कि छोटा आदमी बड़ी फिल्म बना सकता है।

आपको उत्सव में कौन-कौन सी फिल्में पसंद आईं?
दुर्भाग्यवश मैं उत्सव में सिर्फ एक ही फिल्म देख पाया कंडक्टर। व्यस्तता कुछ ज्यादा है।

तो, तिंग्या को हिंदी समेत अन्य भाषाओं में रूपांतरित करने की कोई योजना है?
जी हां, कई सारे प्रस्ताव और चर्चाएं हैं। कन्नड़, मलयालम, हिंदी और फ्रेंच में तिंग्या के रीमेक या डबिंग को लेकर विचार चल रहा है लेकिन अब तक कुछ भी निर्णय नहीं हुआ है। 28 मार्च को तिंग्या महाराष्ट्र भर में रिलीज होगी और संभवत: उसके बाद ही हम किसी नतीजे पर पहुंच सकेंगे।

भविष्य में भी सार्थक सामाजिक सिनेमा रचने का विचार है या कुछ बॉक्स ऑफिस मसाला भी जहन में है?
मैं हमेशा सार्थक सिनेमा ही बनाना चाहूंगा। मैं सामाजिक विषयों पर आधारित कहानियां चुनना चाहता हूं लेकिन स्पष्ट कर दूं कि मैं वामपंथी जरूर हो सकता हूं, कम्युनिस्ट बिल्कुल नहीं। असल में कड़वी दवाई जब मां पिलाती है तो उसमें कुछ मीठा मिला देती है। बस, उसी तरह मैं फिल्में बनाना चाहता हूं। जो सच, जो विषय मुझे पसंद आएगा उसमें थोड़ा सा मनोरंजन मिलाकर मैं फिल्म बनाऊंगा।

सार्थक सिनेमा की लोकप्रियता कैसे बढ़ सकती है? आपके विचार से क्या कदम उठाए जा सकते हैं?
यह तो फिल्मकारों की सोच पर ही निर्भर है। अगर फिल्मकार ठान लें और 10 में से 4-5 फिल्में सार्थक हों तो ज्यादा वक्त नहीं लगेगा ऐसा होने में। आपको धीरे-धीरे एक आदत विकसित करना है दर्शकों की कि वे सार्थक सिनेमा देखने के लिए जाएं। और ऐसा नहीं है कि यह बहुत मुश्किल है। बिमल राय, बीआर चोपड़ा, राज कपूर जैसे फिल्मकारों का बेहतरीन सिनेमा आलोचकों के साथ ही लोगों के दिलों में भी धड़कता रहा है।

जी बेशक, आखिरी सवाल यह है कि सार्थक सिनेमा जिस वर्ग के लिए अधिकांशत: बनता है, उस वर्ग तक पहुंच नहीं पाता, क्यों?
हां हालात ऐसे हैं लेकिन कोशिश करना जरूरी है। और फिर मेरा अनुभव यह है कि तिंग्या जब गोवा में दिखाई जा रही थी तो इसके 7 शो थे। तब एक गेटकीपर ने मुझसे कहा था कि मैं आपकी फिल्म छठवीं बार देख रहा हूं और मुझे बहुत पसंद आई है। साथ ही, तिंग्या को श्याम बेनेगल जैसे निर्देशकों की शाबाशी भी मिली है मुझे। तो मुझे लगता है कि तिंग्या सार्थक सिनेमा है।

मंगेश हडावले : एक परिचय
पश्चिम भारत के एक छोटे से कस्बे में 1980 में जन्मे मंगेश ने पूना विवि के ललित कला केंद्र से थिएटर में स्नातक करने के बाद मुंबई में कदम रखा और फिल्मों में कैरियर बनाने के लिए शुरुआत की। तिंग्या उनकी पहली फिल्म है और इसके लिए मंगेश ने कहानी, पटकथा और संवाद भी लिखे हैं।





अपने विचार यहां लिखें
नाम:
ईमेल आईडी:
भाषा चुनॆ
हिन्दी रॊमन‌ हिन्दी फॊनॆटिक English
विचार:
कोड: