पर्व प्रसंग
सामाजिक एवं वैयक्तिक समरसता का त्योहार है होली। यह उत्सव वसंत के फाल्गुनी मौसम में मन को निर्मल करने का अवसर है। इसमें लोग गिले-शिकवे भुलाकर एक-दूसरे को अबीर, गुलाल एवं रंगों से रंग देते हैं।
फाल्गुन पूर्णिमा को प्रदोषकाल में भद्रा रहित बेला में होलिका दहन किया जाता है और इस अवसर पर गेहूं, जौ एवं चने की बालों को होली की ज्वाला में सेंककर ‘नवान्नेष्टि’ होती है।
हो ली की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह सामाजिक एवं वैयक्तिक समरसता का त्योहार है। इस पर्व की पूरी प्रक्रिया मन के ऊपर जमी मैल की परतों को हटाने की द्योतक है। वस्तुत: होली के अवसर पर धूल, मिट्टी एवं कीचड़ चलाना, बेकार कबाड़ को जलाना और भांग-ठंडाई छानना आदि सभी बातें मन के मैल का त्याग ही है। यह उत्सव वसंत के फाल्गुनी मौसम में मन को निर्मल एवं आह्लादित करने का अवसर है। इसमें लोग ऊंच-नीच का भेद भुलाकर एक-दूसरे को अबीर, गुलाल एवं रंगों से रंग देते हैं। एक-दूसरे के गले मिलते हैं।
पौराणिक कथा
प्रह्लाद दैत्यराज हिरण्यकशिपु का पुत्र था और वह बचपन से ही भगवान श्रीहरि का भक्त था। हिरण्यकशिपु ने घोर तपस्या के जरिए ब्रrाजी से वरदान प्राप्त कर स्वर्ग के इंद्रासन पर अधिकार कर लिया और अजेय बन गया। फिर भी वह अपने भाई हिरण्याक्ष के वधकर्ता भगवान विष्णु से घोर द्वेष करता था। एक दिन उसने अपने पुत्र प्रह्लाद से उसकी शिक्षा के बारे में पूछा तो प्रह्लाद ने श्रीहरि की भक्ति भावना को सर्वश्रेष्ठ शिक्षा बताया। तब वह क्रोध से भड़क उठा और उसने प्रह्लाद को मार डालने की ठान ली।
जब भक्त प्रह्लाद को मारने वाले असुरों के खड्ग-त्रिशूल आदि टूट गए, उसको दिया गया विष अमृत बन गया। पर्वत की चोटी से फेंकने और पत्थर बांधकर डुबोने पर भी जब वह बच गया, तब हिरण्यकशिपु की बहन होलिका ने उसको जलाकर मारने का प्रयास किया। होलिका को वरदान प्राप्त था कि वह अपनी गोद में बैठाकर किसी को भी जला सकती थी, किंतु भक्त प्रह्लाद को जलाने के चक्कर में वह स्वयं जल गई और प्रह्लाद जीवित बच गए। तभी से बच्चों की सुरक्षा के लिए होलिका दहन की परंपरा प्रचलित हुई।
होलिका पूजन
पौराणिक परंपरा के अनुसार माघ की पूर्णिमा के दिन प्रात:काल सभ्यजन जंगल में जाकर शाखा सहित वृक्ष को काटकर लाते हैं और गंध-अक्षत आदि से पूजा कर उसको पश्चिम दिशा में स्थापित करते हैं। इसको ‘होली का डांडा’ या प्रह्लाद कहा जाता है। इसके चारों ओर काठ, कबाड़ एवं उपले लगाकर होली बनाई जाती है।
फाल्गुन मास की पूर्णिमा के दिन अपराह्न्/सायंकाल में लोग पूर्व में स्थापित होली के पास जाकर अपनी परंपरा के अनुसार उसकी पूजा कर प्रार्थना करते हैं -
‘असृव्याभयसंत्रस्तै: कृžवा त्वं होलिव्यालिशै:। अतस्त्वां पूजायिष्यामि भूते भूतिप्रदा भव॥’
अर्थात : हे भूत! राक्षसी के भय से संत्रस्त अज्ञानी लोगों ने तुम्हारी रचना की थी। मैं तुम्हारी पूजा करता हूं। तुम हमें सुरक्षा एवं ऐश्वर्य प्रदान करो।
होलिका-दहन एवं नवान्नेष्टि
फाल्गुन पूर्णिमा को प्रदोषकाल में भद्रारहित बेला में होलिका दहन किया जाता है और इस अवसर पर गेहूं, जौ एवं चने की बालों को होली की ज्वाला में सेंककर ‘नवान्नेष्टि’ होती है। कुछ लोग होली की आग को घर लाकर उससे अपने आंगन में काठ एवं उपले जलाकर उसमें नवान्न एवं गुड़ के पकवानों से नवान्नेष्टि करते हैं।
धूलिवंदन या धुलैंडी
होलिका दहन के अगले दिन प्रात:काल सभी बालक, युवा, वृद्ध, नर-नारी होली की भस्म को माथे पर लगाते हैं, एक-दूसरे के मुख पर अबीर-गुलाल लगाकर गले मिलते हैं और सारे गिले-शिकवे दूर करते हैं। भांग-ठंडाई छानना, गुझिया-मिठाई खाना और पिचकारियों से रंग चलाकर एक-दूसरे को रंगों में सराबोर करना आदि इस वसंत के त्योहार की मादकता को चहुंओर फैलाते हैं।
होलाष्टक में निषिद्ध कार्य
इस बार फाल्गुन शुक्ल अष्टमी से पूर्णिमा तक अर्थात 14 मार्च से 21 मार्च तक होलाष्टक रहेगा। इसमें अष्टमी को चंद्रमा, नवमी को सूर्य, दशमी को शनि, एकादशी को शुक्र, द्वादशी को गुरु, त्रयोदशी को बुध, चतुर्दशी को मंगल और पूर्णिमा को राहु पाप प्रभावग्रस्त होता है अत: होलाष्टक में शुभकार्य नहीं किए जाते। इसका खास ध्यान रखना चाहिए।
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