पर्व महत्व
होली के दिन सूर्य उच्चभिलाषी बना रहता है तथा विषुवत के करीब रहता है। इससे अन्य ग्रह अपने-अपने प्रभाव के लिए स्वतंत्र हो जाते हैं। विभिन्न प्रकार के रंग सभी ग्रहों से अनुप्राणित रहते हैं या ग्रहों का प्रतिनिधित्व करते हैं। एक के हाथ से दूसरे के चेहरे पर या शरीर पर किया जाने वाला प्रेम लेप परस्पर ग्रहजन्य बाधाओं को दूर करता है जो मानसिक, शारीरिक एवं सामाजिक व्यवसाय में सकारात्मक परिणाम प्रदान करने वाला होता है।
विभिन्न प्रकार के रंग सभी ग्रहों से अनुप्राणित रहते हैं या ग्रहों का प्रतिनिधित्व करते हैं, लेकिन मंगल पाषाण चूर्ण से निर्मित गुलाल या अन्य रंगों का, बुध पत्तियों से बने रंगों का, शुक्र मनोवेग को, सूर्य लक्ष्य को एवं गुरु चिंतन को नियंत्रित करता है। होलिका दहन के दौरान होली की शिखा का प्रवाह रात्रि में जिस दिशा को जाता है, उस दिशा में अनिष्ट, प्राकृतिक प्रकोप, राजदोष आदि की आशंका बढ़ जाती है।
वेद में विभिन्न यज्ञों का उल्लेख मिलता है जिसमें चातुर्मास्य इष्टि भी प्रमुख है। यह यज्ञ चार-चार महीने के अंतर से किया जाता है। फाल्गुन मास में किया जाने वाला नवान्नेष्टि यज्ञ इस पूर्णिमा को किया जाता है। इसमें नवीन फसल की आहुति देकर उससे शेष अन्न को प्रसाद रूप में ग्रहण करने की परंपरा है जो आज भी बनी हुई है।
हम होली पर नए अन्न को भूनकर ग्रहण करते हैं। यही भुना अन्न होलका नाम से जाना जाता है और इसी के आधार पर यह पर्व होलिका कहलाता है। होलिका के मध्य रोपा गया होलिका का डांडा प्रह्लाद का सूचक है और यही वैदिक यज्ञस्तंभ का प्रतीक कहा गया है।
धर्मशास्त्र के अनुसार भद्रा रहित पूर्णिमा में होलिका दहन करना चाहिए। यह भद्रा विष्टि नामक करण है, जो प्रत्येक पूर्णिमा के पूर्वार्ध में रहता है। इसमें होलिका दहन से राष्ट्र का विनाश कहा गया है। यदि भद्रा रहित प्रदोष न मिले और प्रतिपदा का क्षय हो तो भद्रामुख (भद्रा के कुल मान के चौथे भोग की शुरू की ५ घटी यानि दो घंटे) छोड़कर तीसरे भाग की अंतिम तीन घटी भद्रा पुच्छ में होलिका दहन करना चाहिए। इस बार भद्रा प्रात: ११:४५ तक रहेगी, अत: प्रदोषकाल में होलिकादहन किया जाएगा।
होली पर ढुंढा नामक राक्षसी के विनाश व उससे बच्चों की रक्षा के लिए ढूंढ़ पूजने की परंपरा प्रचलित है। वस्तुत: होली के दिन प्रदीप्त अग्नि ऋतु संधि में उत्पन्न संक्रामक रोगों का नाश करती है और इस अवसर पर किए जाने वाले हास-परिहास व नृत्य-गीतादि के कार्यक्रम स्फूर्तिदायक होते हैं, जैसा कि कहा है-
तीक्ष्णर्वमननस्याद्यैर्लघुरूक्षैश्च भौजनै:।व्यायामोद्वर्तनधातोर्जित्वा श्लेष्माणमुल्बणम्॥
अत: होली पर विभिन्न प्रकार के हास-परिहास के कार्यक्रम किए जाते हैं। इस दिन होली के दहन में दूध के छींटे देने, नारियल व अनार चढ़ाने का विधान है। दूसरे दिन चांडाल दर्शन कर स्नान करने से वर्ष भर शारीरिक व मानसिक पीड़ा से मुक्ति मिलती है। इस दिन देवपितृतर्पण करके दुष्टों के विनाश के लिए होलिका की भस्म को प्रणाम करना चाहिए। इस तरह हम होली पर अपने समस्त अवगुणों को होम कर सकारात्मक जीवन की शुरुआत भी कर सकते हैं।
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