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घटती संख्या के अलावा दूसरे संकट भी हैं बाघों पर

देश के दो तिहाई बाघों के गायब हो जाने को उजागर करती भारतीय वन्य प्राणी संस्थान(डब्ल्यूआईआई) की रिपोर्ट ने हालांकि बाघ संरक्षण में लगे सरकारी, गैर-सरकारी लोगों की नींद उड़ा दी है, लेकिन क्या वे इसके बाद भी सचेत माने जा सकते हैं? नेशनल टाइगर कंजर्वेशन अथॉरिटी (एनटीसीए) की पहल पर हुई देश के टाइगर रिजर्व के बेचैन फील्ड डायरेक्टर्स की कान्हा कांफ्रेंस में बाघों की आबादी को वापस पटरी पर लाने के लिए बातें तो तल्खी से हुईं, लेकिन सवाल है कि इससे बाघों की सेहत पर क्या फर्क पड़ेगा?

दो दिन की इस लगभग गुप्त कांफ्रेंस में शामिल होने वाले अनेक फील्ड डायरेक्टर्स ने डब्ल्यूआईआई की रिपोर्ट को ही कटघरे में खड़ा कर दिया था। वजह थी, देश में पहली बार इस्तेमाल की गई वह नमूना पद्धति, जिसमें तीन चरणों में विस्तार से बाघों की गिनती करने के बावजूद अंतत: वह एक अनुमान ही है। इस पद्धति में एक निर्धारित क्षेत्र में बाघों की आबादी के घनत्व को मापकर उसे बाकी के इलाके पर लागू मान लिया जाता है।

दबी जुबान में फील्ड डायरेक्टर्स इसे पगमार्क की 40 साल पुरानी पद्धति के मुकाबले कमजोर बताते रहे। उनका कहना है कि पगमार्क में एक-एक बाघ की गणना करने की कोशिश की जाती है और वन विभाग का मैदानी अमला इस प्रक्रिया से अच्छी तरह वाकिफ होता है। आखिर कम पढ़े-लिखे बीट या फारेस्ट गार्ड इस अत्याधुनिक और वैज्ञानिक कही जाने वाली पद्धति से उजागर हुई बाघों की जो संख्या बता रहे हैं, वह कितनी भरोसेमंद मानी जाए?

दूसरी तरफ, केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय की एनटीसीए इस तर्क को खारिज करती है। उसके सदस्य-सचिव डॉ. राजेश गोपाल ने मीडिया से भी साफ कहा कि पगमार्क पद्धति के दिन लद गए हैं और अब से नई वैज्ञानिक नमूना पद्धति से बाघों की गिनती की जाएगी। डॉ. गोपाल डब्ल्यूआईआई की ताजा रिपोर्ट को अब तक की सबसे वैज्ञानिक और विश्वसनीय रिपोर्ट मानते हैं।

ऐसे में एक सवाल कान्हा में तैरता रहा कि क्या केंद्र की एनटीसीए राज्यों के वन विभागों से अपनी बात मनवा लेगी? बाघ संरक्षण में लगने वाला लगभग सारा पैसा केंद्र के खजाने से आता है और यदि इसकी खातिर राज्यों ने हामी भर भी दी, तो उसे कितनी ईमानदारी से क्रियान्वित किया जा सकेगा? कान्हा कांफ्रेंस के नतीजों में एक 15 अप्रैल 2008 तक टाइगर कंजर्वेशन प्लान, बफर जोन और टाइगर रिजर्वो के बीच कॉरीडोर निर्माण के प्रस्ताव तैयार करना है।

विस्थापन के खिलाफ वनवासी समाज में जोर पकड़ती तीखी आवाजों के अलावा बफर जोन और कॉरीडोर की सीमा में आने वाले गांवों को हटाना टेढ़ी खीर साबित होगा। इसके लिए वैधानिक जरूरतों को पूरा करना और वह भी हाल के वनाधिकार कानून के चलते कठिन होगा। वनाधिकार कानून में क्रिटिकल टाइगर हैबीटाट के अलावा कहीं भी बसे आदिवासियों और परंपरागत वन निवासियों को हटाने के पहले उनके अधिकारों का निर्धारण जरूरी है। वनविभाग वनवासियों के हकों को अब तक तय नहीं कर पाया है और इसीलिए राष्ट्रीय उद्यानों के नोटीफिकेशन का मामला खटाई में पड़ा है।

कान्हा कांफ्रेंस में विस्थापन के प्रस्तावों के लिए भी 15 मई 2008 की तारीख तय की गई है। इस बार विस्थापितों के हरेक परिवार को बढ़े हुए दस लाख रुपए का लाभ तो मिलेगा, लेकिन पीढ़ियों से बसे लोगों को उनकी जड़-जमीन, देव-धामियों से अलग करना दुष्कर होगा। उन होटलों, रिसॉर्टो को हटाने में भी वन विभाग को पसीना छूट सकता है, जो अपने मालिकों के राजनीतिक, आर्थिक प्रभावों के चलते तमाम नियम-कायदों को दरकिनार कर खड़े किए गए हैं।

राज्य सरकारों की नीतियां भी वन और वन्यप्राणियों की बजाय पर्यटन से पैसा कमाने को अधिक तरजीह देती हैं। हालांकि अधिकारी वन्यप्राणियों की कीमत पर होने वाले पर्यटन का विरोध करते रहे, लेकिन क्या वे ऐसे पर्यटन को बंद करवा पाएंगे? नक्सलवाद की जिस समस्या को प्रधानमंत्री देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा मानते हैं, उसकी आंच वन्यप्राणी संरक्षण पर भी पड़ी है।

यहां तक कि इंद्रावती, पलामू, कुद्रेमुख, सिमलीपाल, बक्सा जैसे अनेक टाइगर रिजर्व में नक्सलियों के चलते बाघों की गिनती तक नहीं हो पाई। इन इलाकों में वन विभाग के प्रवेश न कर पाने के कारण वहां का आकलन नहीं हो पाया है। कांफ्रेंस में इसका जिक्र तो किया गया, लेकिन उससे निपटने की कोई तरकीब पर बात नहीं हो पाई।

इस सबके बावजूद कांफ्रेंस बाघ संरक्षण के लिए टाइगर प्रोटेक्शन फोर्स के गठन, मुखबिरी के नेटवर्क को मजबूत करने और बरसों से बंद पड़ी फारेस्ट गार्डो की भरती खुलने जैसे मुद्दों पर चर्चा के कारण सफल मानी जा सकती है। डॉ. गोपाल इस कांफ्रेस को पारिस्थितिकी के शिखर पर बैठे बाघों और वनों को बचाने की ओर बढ़ा एक सकारात्मक कदम मानते हैं। लेकिन क्या केंद्र सरकार की पहल पर हो रहे इन प्रयासों को राज्यों के वन विभाग और सरकारें उतनी ही अहमियत देंगे?





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