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निजता में दखल देते मार्केट रिसर्चर

विकास मंत्र. मैं घर से निकल ही रहा था कि दरवाजे की घंटी बजी। सामने एक खूबसूरत लड़की खड़ी थी, जो एक बड़ी कंपनी की फ्रीलांस रिसर्चर थी। उसने कंज्यूमर मार्केट रिसर्च के नाम पर दस मिनट मांगे और एक प्रश्नावली मुझे थमा दी। सामान्य सवालों से तो खैर कोई दिक्कत नहीं हुई, लेकिन फिर वह विभिन्न कंपनियों के पुरुष अधोवस्रों के बारे में मेरे अनुभव पूछने लगी, जिन्हें मैं अब तक अंदर की बात मानता था।

मैं अधोवस्त्र कहां से खरीदता हूं? कब-कब खरीदता हूं? उनके चुनाव में मेरी पत्नी या किसी और की क्या भूमिका होती है? कौन से रंग पसंद हैं? किस स्टाइल के खरीदता हूं? कितने मेरे पास हैं? कितने पुराने हैं?

मुद्दा यह है कि मार्केट रिसर्च लोगों की निजता में दखल दे रहे हैं। जाहिर है, केवल इच्छुक लोगों की निजता में ही। एक शहरी भारतीय गृहिणी को हर माह कम से कम एक मार्केट रिसर्चर का फोन मिल ही जाता है। कभी वह अधोवस्रों के बारे में और कभी आटे के बारे में सर्वे के सवालों का जवाब दे रही होती हैं। भारतीय घरों में मार्केट रिसर्चरों की ताक-झांक से कई चिंताएं उभरती हैं।

दो पर विचार कीजिए : ये रिसर्चर आपके बारे में बहुत-सी बातें जानने लगते हैं और आपको एक क्लोन उपभोक्ता में बदल देते हैं। आप जो बताते हैं, उस आधार पर आपके जैसे औसत उपभोक्ताओं के लिए प्रोडक्ट या सेवा लांच कर देते हैं। दूसरे, इस किस्म के प्रश्नों पर धोखा देना बड़ा आसान है। क्या गारंटी है कि मैं सही जवाब ही दे रहा हूं? हो सकता है मैं प्रभावित करने के लिए उम्र कम बता रहा हूं या एस्टीम की बजाय अपने को पजेरो कार का मालिक दिखा रहा हूं। क्या हमारे मार्केट रिसर्चरों के पास इनका कोई जवाब है?

-लेखक प्रख्यात मैनेजमेंट कंसल्टेंट हैं।





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