दृष्टिकोण. दुनिया में हर तरफ भारत के ही चर्चे हो रहे हैं। भले ही वह आईटी का क्षेत्र हो या बॉलीवुड या फाइनेंस या फिर फैशन का। एक लिहाज से देखें तो पिछला साल भारतीय फैशन के लिए अच्छा गया। चार फैशन सप्ताहों के अलावा तमाम मॉल, बुटीक और फैशन स्टोर अस्तित्व में आए। भारतीय डिजायनर न सिर्फ दुनिया के कोने-कोने में गए, बल्कि वहां से सराहना भी हासिल कर लौटे।
सब्यसाची मुखर्जी और आशीष सोनी न्यूयॉर्क फैशन वीक में अपना झंडा गाड़ने में कामयाब रहे, तो मनीष अरोड़ा और अनामिका खन्ना लंदन फैशनवीक में छाए रहे। तरुण ताहिल्यानी, नीता लुल्ला और विक्रम फड़नीस डरबन फैशन वीक में सराहे गए। सच तो यह है कि जोहान्सबर्ग में अपना फैशन स्टोर खोलने वाले विक्रम पहले भारतीय डिजायनर भी बनकर उभरे। नरेंद्र कुमार अहमद और वैंडल रॉड्रिक्स द्वारा पेरिस में पेश की गई प्रॅत श्रंखला की जमकर तारीफ हुई, तो देवरा निल ऑस्ट्रेलियाई फैशन सप्ताह में वाह-वाही बटोरकर लौटे।
पिछले दिनों दिल्ली में संपन्न विल्स फैशन सप्ताह के बाद स्वाभाविक प्रश्न उपजता है कि क्या यह वर्ष भी इतनी ही उपलब्धियों से परिपूर्ण रहेगा? इसका जवाब इसमें निहित है कि भारतीय डिजायनर किस तरह से स्वयं को प्रोजेक्ट करते हैं। जहां तक फैशन का सवाल है, तो भारत खासी लाभ की स्थिति में है। भारतीय कट-स्वरूप से विदेशी लेबल तक प्रेरणा ले रहे हैं।
उन्होंने परंपरागत भारतीय परिधान मसलन चूड़ीदार और कुरते को अपने संग्रह में स्थान देने में कोताही नहीं की है। इसके बावजूद भारतीय डिजायनर मुख्यधारा के अंतरराष्ट्रीय फैशन बाजार में अपनी जोरदार उपस्थिति नहीं दर्ज करा पा रहे हैं। सही है, ब्रिटेन के सेल्फरिज और ब्राउन्स और संभवत: अमेरिका के ब्लूमिंगडेल्स या मैकी समेत हांगकांग, दुबई और सिंगापुर के कुछ चुनिंदा स्टोरों में भारतीय डिजायनरों के संग्रह मिल जाएंगे, लेकिन जहां तक सवाल आम विदेशी लोगों का है तो शायद ही वे भारतीय डिजायनरों के नाम जानते हों। यह तब है जब वे जापान के इजी मियाके, हनाई मोरी और योझी यामामोटो के नाम से अच्छे से परिचित हैं।
भारतीय डिजायनर जनसंपर्क, विज्ञापन और प्रोफेशनलिज्म के क्षेत्र में तो मात खाते ही हैं, साथ ही पश्चिमी बाजार की मूलभूत आवश्यकता का भी उन्हें अपर्याप्त ज्ञान है। अधिकांश भारतीय डिजायनर भारत में ही रहकर पश्चिमी महिला के लिए संग्रह तैयार करने की आशा में जीते हैं। नतीजतन उनके डील-डौल, रंग, कट-स्वरूप और स्टाइल को लेकर वे गलत साबित होते हैं।
कई भारतीय डिजायनर बड़े पैमाने पर ऑर्डर की पूर्ति करने में अक्षम हैं और अपने चुनिंदा फैशन शो पीस को बेचकर ही खुश हो लेते हैं। भारतीय डिजायनर्स भारी-भरकम अलंकरण और कढ़ाई पर अत्यधिक निर्भर रहते हैं। फॉर्मल पोशाकों के लिहाज से इसमें कोई बुराई नहीं है, लेकिन ये पोशाकें देखभाल बहुत मांगती हैं। इसी तरह रेडीमेड कपड़ों में कढ़ाई भी बुरी नहीं है, क्योंकि पश्चिमी खरीदारों को हमारी कला और गुणवत्ता पसंद है। इसके बावजूद भारतीय डिजायनरों को व्यावहारिक नजरिया अपनाते हुए वॉशिंग मशीन में धुल सकने लायक पोशाकें ही तैयार करनी चाहिए।
इसी तरह कई डिजायनर संग्रहों की कोई खास थीम या लुक नहीं होती। अंतरराष्ट्रीय फैशन का मतलब सिर्फ पश्चिमी पोशाकें ही हैं, इस क्षेत्र में भारतीय डिजायनरों ने कोई खास सफलता अर्जित ही नहीं की है, क्योंकि उनका फैशन ज्ञान परंपरागत भारतीय पोशाकों तक ही सीमित है। हालांकि विदेशी खरीदार भारतीय फैशन सप्ताह में शिरकत करने जरूर आते हैं।
कारण, वे अपने ग्राहकों के लिए दूसरे देशों में उभरते नवीनतम फैशन को खरीदने के लिए उत्सुक रहते हैं। हालांकि स्टाइल, कीमत, क्वालिटी और डिलीवरी का स्तर अमूमन उनके कठोर मानकों पर खरा नहीं उतरता। भारतीय डिजायनरों को इसे समझते हुए ऐसी पोशाकें तैयार करनी चाहिए, जो भारतीय कला का स्पर्श तो लिए हों, लेकिन प्रकृति में पाश्चात्य पहनावे की श्रेणी में आती हों। दूसरी तरफ, भारतीय डिजायनरों के जेहन में बिक्री के लिए सिर्फ अमेरिका और यूरोप ही घूमा करता है। मध्य और सुदूर पूर्व समेत अफ्रीका और दक्षिणी अमेरिका सरीखे देश भारतीय परिधानों के बड़े खरीददार साबित हो सकते हैं। इस दिशा में पूरी क्षमता से जुट जाने की जरूरत है।
भारतीय डिजायनरों को यह भी याद रखना होगा कि पाकिस्तान, दक्षिण अफ्रीका, बांग्लादेश, ग्रीस, तुर्की और ब्राजील सरीखे देश फैशन परिदृश्य पर तेजी से उभर रहे हैं। उनके पास प्रतिभाशाली डिजायनर्स हैं, जिनके बलबूते वे फैशन परिदृश्य पर हलचल पैदा कर रहे हैं। इस परिप्रेक्ष्य में रोचक बात यह है कि विशाल आबादी वाला देश भारत फैशन के लिए एक बेहद उपयुक्त बाजार है, लेकिन भारतीय डिजायनरों को इसमें कोई रुचि ही नहीं है।
वे पश्चिम से स्वीकार्यता के तलबगार हैं। एक ऐसा देश जहां दिग्गज अंतरराष्ट्रीय ब्रांड अपने स्टोर खोलने में दिलचस्पी दिखा रहे हैं। ये अंतरराष्ट्रीय लेबल तेजी से बढ़ रहे भारतीय मध्य वर्ग को अपना निशाना बना रहे हैं। इसके बावजूद भारतीय डिजायनर इस ओर से आंखे बंद किए हुए हैं। पिछले दिनों दिल्ली में संपन्न फैशन समारोह में अंतरराष्ट्रीय खरीददारों की जुटी भीड़ उत्साहवर्धक रही।
ऐसे में आने वाले महीने में मुंबई में होने वाले फैशन सप्ताह में इस भीड़ के और बड़ी होने की उम्मीद ही की जा सकती है। साथ ही सिर्फ यही कहा जा सकता है कि अगर भारतीय डिजायनरों ने विशाल भारतीय बाजार की जरूरतों को पूरा करने के बाद योजनाबद्ध तरीके से वैश्विक स्तर पर विस्तार पर ध्यान दिया, तो आने वाला वक्त उनका ही होगा।
-लेखिका पूर्व मिस इंडिया और ख्याति प्राप्त फैशन टिप्पणीकार हैं।