HomeVichaar Vichaar

छोटे राज्यों का सवाल

संपादकीय. समुचित विकास और बेहतर प्रशासन के लिए छोटे राज्यों के गठन की मांग और उस पर की जाने वाली राजनीति नई नहीं है। ऐसे में उत्तरप्रदेश के बंटवारे को लेकर बनाया जा रहा माहौल, देश के दूसरे हिस्सों से उठ रही इस तरह की मांगों को प्रभावित किए बिना नहीं रहेगा। पिछले कुछ वर्षो में उत्तराखंड, झारखंड और छत्तीसगढ़ के रूप में नए प्रदेश सामने आए, तो अलग तेलंगाना, विदर्भ और गोरखालैंड के लिए संघर्ष जारी है।

इस बीच प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह द्वारा उत्तरप्रदेश के पूर्वाचल इलाकों के पिछड़ेपन को दूर करने के नुस्खे के तौर पर विभाजन का आश्वासन मुख्यमंत्री मायावती के लिए नहले पर दहला जड़ने के एक अवसर के रूप में सामने आया। मायावती ने फौरन प्रदेश को तीन हिस्सों में बांटने की अपनी पुरानी मांग का नवीकरण कर डाला। सिर्फ मुख्यमंत्री के चिट्ठी दिखाने भर से कोई नया राज्य नहीं बन जाता। उसकी एक प्रक्रिया है, जिसके तहत विधानसभा से बाकायदा प्रस्ताव पारित करके केंद्र को भेजा जाता है और केंद्र संसद से उसका अनुमोदन करवाकर नए राज्य के गठन का रास्ता साफ करता है।

कांग्रेस भी छोटे राज्यों के गठन की समर्थक रही है और उसने उत्तरप्रदेश को भी छोटे-छोटे राज्यों में बांटने का कभी विरोध नहीं किया है। यह अलग बात है कि इस सैद्धांतिक सहमति के बावजूद कांग्रेस कभी भी किसी भी क्षेत्र को अलग से राज्य बनाने को लेकर आंदोलन वगैरह चलाने से परहेज ही करती रही है, बल्कि तेलंगाना और विदर्भ के मसले पर उसे ठंडा रुख अख्तियार करते भी देखा गया है।

हर राज्य और क्षेत्र की भू राजनीतिक स्थितियां एक जैसी नहीं होतीं। फिर भी जैसे आंदोलन उत्तराखंड, झारखंड और छत्तीसगढ़ को लेकर चले या तेलंगाना और विदर्भ को लेकर आज भी चल रहे हैं, वैसा कुछ पूर्वाचल, बुंदेलखंड और पश्चिमी उत्तरप्रदेश को लेकर नहीं दिखाई पड़ा। अजीत सिंह जरूर गाहे-बगाहे अपनी आवाज बुलंद करने की कोशिश करते रहे हैं, पर कभी उसे जनांदोलन की शक्ति नहीं दे पाए।

इसलिए कभी-कभी इस बात को लेकर संदेह पैदा होता है कि उत्तरप्रदेश के विभाजन को लेकर विभिन्न राजनीतिक दलों और नेताओं की ओर से आने वाले वक्तव्यों को वास्तविक जनसमर्थन कितना प्राप्त है? बेहतर प्रशासन और जनाकांक्षाओं की समुचित देखभाल के लिए नि:संदेह छोटे राज्य एक बेहतर विकल्प हो सकते हैं। लेकिन जब ऐसे मुद्दे महज राजनीतिक शिगूफे में तब्दील होने लगते हैं, तो तय मानिए कि वे अपनी तार्किक नियति तक नहीं पहुंच सकते।





अपने विचार यहां लिखें
नाम:
ईमेल आईडी:
भाषा चुनॆ
हिन्दी रॊमन‌ हिन्दी फॊनॆटिक English
विचार:
कोड: