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तिब्बत में विदेशियों को प्रवेश नहीं

बीजिंग. b तिब्बत में हुए दंगों को देखते हुए चीन के सुरक्षा बलों ने और अधिक सख्ती बरतने का निश्चय किया है। क्षेत्र के गवर्नर ने सोमवार को यह जानकारी देते हुए वादा भी किया कि सख्त सजा केवल उन्हीं को दी जाएगी जो कि हिंसा में लिप्त होंगे। इस बीच चीन ने तिब्बत की स्थिति से निपटने के लिए और सैनिक भेजे हैं।

तिब्बती सरकार के प्रमुख कियांग्बा पंकोग ने बताया, ‘मैं पूरी जिम्मेदारी के साथ कह सकता हूं कि हम गोलीबारी समेत घातक हथियारों का इस्तेमाल नहीं करेंगे।’ उन्होंने बताया कि आदेश मानने वालों तथा पछतावा जताने वालों के खिलाफ नरमी बरती जाएगी और उन्हें संभवत: ‘पुनर्शिक्षण’ की सजा दी जाएगी जबकि अन्य के साथ अत्यधिक सख्ती से निपटा जाएगा।

नो एंट्री : चीन ने तिब्बत में विदेशियों के घुसने पर पाबंदी लगा दी है तथा मौजूदा पर्यटकों को वहां से बाहर निकल जाने को कहा है। क्षेत्रीय सरकार ने सुरक्षा कारणों से तिब्बत यात्रा संबंधी विदेशियों के आवेदनों का निपटारा स्थगित कर दिया है।

मानवाधिकार का मुद्दा उठा सकते हैं ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री

मेलबोर्न. ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री केविन रूड ने तिब्बत में चीन के दमनचक्र को विचलित करने वाला बताया है। यह भी खबर है कि केविन अगले माह अपनी प्रस्तावित चीन यात्रा में मानवाधिकारों का मुद्दा उठा सकते हैं।

प्रदर्शन: उधर, चीन के शासन के खिलाफ तिब्बतियों की बगावत की 49वीं वर्षगांठ के बाद से दुनियाभर में तिब्बतियों के समर्थन में रोज प्रदर्शन हो रहे हैं। पेरिस स्थित चीनी दूतावास के बाहर रविवार को प्रदर्शनकारियों को तितर-बितर करने के लिए पुलिस ने आंसू गैस का इस्तेमाल किया। न्यूयॉर्क में चीनी वाणिज्य दूतावास के बाहर प्रदर्शनकारियों ने अधिकारियों पर पथराव किया।

संसद में तिब्बत मामले की गूंज

तिब्बत की हिंसा के मामले में केंद्र सरकार ने सोमवार को संसद में संतुलित रवैया अपनाए रखा। सरकार ने विपक्ष द्वारा जोर डालने के बावजूद हिंसा की भत्र्सना तो नहीं की लेकिन ‘खेद’ जरूर जताया। इस मुद्दे पर चीन की संवेदनशीलता और देश की नीति के प्रति दृढ़ रहने का ध्यान रखते हुए विदेश मंत्री प्रणव मुखर्जी ने संसद में कहा, ‘हम ल्हासा की अस्थिर स्थिति, हिंसा तथा निर्दोष लोगों की मौत की रिपोर्टे पर खेद जताते हैं’।

तिब्बती प्रदर्शनकारियों के खिलाफ चीन के दमनचक्र का मुद्दा संसद के दोनों सदनों में उठा। लोकसभा में इस मुद्दे पर हंगामा हुआ। वामदलों को छोड़कर कई पार्टियों ने ल्हासा में हो रहे ‘सांस्कृतिक नरसंहार’ पर चिंता जताई। भाजपा, बीजद, सपा और राजद के सदस्य चाहते थे कि भारत हिंसा का विरोध करते हुए संयुक्त राष्ट्र से फौरन हस्तक्षेप करने की मांग करे।

राज्यसभा में पूर्व विदेश मंत्री यशवंत सिन्हा ने सरकार पर इस मामले में घुटने टेकने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा, ‘हमारे चीन से अच्छे संबंध जरूर हैं लेकिन मेरा विनम्रतापूर्वक सुझाव है कि इसका मतलब यह नहीं कि हम समर्पण कर दें’।

‘ल्हासा में उपद्रव हुए हैं। हम केवल इतना कह सकते हैं कि यह चीन का अंदरूनी मामला है।’

सीताराम येचुरी, वरिष्ठ माकपा नेता





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