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Chandigarh Chandigarh चंडीगढ़पश्चिमी कमान डिफेंस एस्टेट ऑफिस के तहत कई कंटोनमेंट बोर्ड में कुछ लोगों की मिलीभगत से मोबाइल कंपनियों के टावर लगा दिए गए हैं जबकि इसके लिए रक्षा मंत्रालय से अनुमति लेना जरूरी है। इनसे सरकार को करोड़ों के राजस्व का चूना भी लगा दिया गया है।
डिफेंस एस्टेट ऑफिस ने कंपनियों को टावर के लिए मंजूरी देने से पश्चिमी कमान के जनरल ऑफिसर कमांडिंग इन चीफ को भी जानकारी देना गवारा नहीं समझा। 2002 से 2006 में ये टावर लगाए गए हैं। इस दौरान डिफेंस एस्टेट ऑफिस के वर्तमान डायरेक्टर जनरल बलशाम सिंह ही पश्चिमी कमान के प्रिंसीपल डायरेक्टर थे उन्होंने मंत्रालय से मंजूरी लिए बगैर ये टावर लगने दिए।
कंट्रोलर ऑडिट जनरल डिफेंस एस्टेट ऑफिस इस घोटाले की ऑडिटिंग कर रहा है। डिफेंस एस्टेट ऑफिस चंडीगढ़ इस मामले में कुछ कहने से बच रहा है। प्रिंसीपल डायरेक्टर डिफेंस एस्टेट ऑफिस चंडीगढ़ के तहत 13 कंटोनमेंट बोर्ड हैं। 2002 से 2006 के बीच दिल्ली, अंबाला, जालंधर और फिरोजपुर छावनियों में कंपनियों ने मोबाइल टावर और डिफेंस लैंड खोद कर ऑप्टिकल फाइबर केबल बिछाए हैं
टावर लगाने के लिए कंटोनमेंट बोर्ड ने ईओ (इस्टेट ऑफिसर) से मिलकर अनुमति दे दी जबकि कंटोनमेंट बोर्ड एक्ट 1924 के तहत रक्षा मंत्रालय से मंजूरी जरूरी थी। प्रिंसीपल डायरेक्टर पश्चिमी कमान ने टावर लगाने के लिए गो अहेड सेंक्शन दी थी। दिल्ली छावनी में रिलायंस इन्फोकॉम लिमिटेड (2), टाटा टेली सर्विसेस, आइडिया सेलुलर ने मार्च 2003 से अप्रैल 2004 के भीतर टावर लगाए। रिलायंस को तो मोबाइल टावर स्कूल बिल्डिंग पर लगाने की अनुमति दे दी गई।
रक्षा मंत्रालय द्वारा इस संबंध में 30 मार्च 2005 को प्रिंसीपल डायरेक्टर से जवाब तलब किया गया, लेकिन आज तक कोई जवाब नहीं मिल पाया है।
जालंधर कंटोनमेंट बोर्ड
जालंधर छावनी में लगे 5 टावरों में से चार डिफेंस लैंड पर हैं, एक प्राइवेट लैंड पर है। यहां पर एयरटेल (2002), रिलायंस (2004), स्पाइस (2002) और हच (2004) का टावर लगा है। कंटोनमेंट बोर्ड ने यहां भी रक्षा मंत्रालय की मंजूरी लिए बगैर जमीन लीज पर दे दी। टावरों के लिए कंटोनमेंट बोर्ड के खाते के बजाए छावनी में ओल्ड ग्रांट प्रॉपर्टीज होल्डर को किराया जा रहा है।
फिरोजपुर कंटोनमेंट बोर्डफिरोजपुर छावनी में कनेक्ट के लिए दो लाख में भूमि लीज पर दी गई। एयरटेल को एक लाख रुपए प्रति वर्ष रेवन्यू पर भूमि लीज दी गई। बीएसएनएल को केबल बिछाने की मंजूरी दी गई। स्पाइस को बीटीएस टावर के लिए अप्रैल 2006 में 1 लाख 75 हजार प्रतिवर्ष पर भूमि दी गई। लीज पर दी डिफेंस लैंड के लिए रक्षा मंत्रालय से मंजूरी नहीं लगी गई।
नो राइट फॉर इंफोर्मेशनप्रिंसीपल डायरेक्टर रक्षा संपदा कार्यालय से अनधिकृत रूप से लगे इन टावर के बारे में पूछने पर संबंधित कार्यालय ने कोई जानकारी नहीं दी।
कार्यालय ने डगशाई, जतोग, कसौली, सुबाथू और डलहौजी जैसे उन कंटोनमेंट बोर्ड की जानकारी दी जहां इस तरह से टावर लगे ही नहीं है। कार्यालय द्वारा दी कुछ जानकारियां अधूरी थी, कुछ गलत।
कमान के अधीन ये हैं बोर्ड-दिल्ली, जम्मू, अमृतसर, जालंधर, अंबाला, फिरोजपुर, डगशाई, कसौली, जतोग, सुबाथू, डलहौजी, बकलोह और योल।
अवैध रूप से लगे टावरों के बारे में मुझे बात नहीं करनी। मेरे पास कोई भी जानकारी नहीं है। वी.के. श्रीवास्तव प्रिंसीपल डायरेक्टर, रक्षा संपदा कार्यालय पश्चिमी कमान चंडीगढ़
ताक पर रख दिए सारे नियमकंटोनमेंट बोर्ड के पास मोबाइल टावर लगाने का अधिकार नहीं। प्रिंसीपल डायरेक्टर बिना रक्षा मंत्रालय की अनुमति से टावर नहीं लगवा सकता है कंटोनमेंट बोर्ड एक्ट-1924 के तहत बोर्ड के पास ऐसे अधिकार नहीं। पश्चिमी कमान के जनरल ऑफिसर कमांडिंग इन चीफ को जानकारी नहीं दी।