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आखिर इसे बजट कैसे कहा जाए!

विशेष टिप्पणीजट से जनता जनार्दन को बड़ी उम्मीद रहती है। एक तरह से यह मौका होली, दीवाली, बैसाखी और लोहड़ी की तरह ही एक सालाना वित्तीय त्यौहार की तरह होता है। समाज के हर वर्ग को उम्मीद होती है कि सरकार बहादुर की ओर से उसे कुछ न कुछ मिलेगा। लेकिन पंजाब सरकार के इस बजट ने सभी को निराश कर दिया है। सब कुछ जस का तस है।

दु:ख इस बात का है कि यह सब एक सोची-समझी साजिश के तहत हुआ है। यह जगजाहिर है कि सरकार का खजाना खाली है और राज्य भविष्य की चुनौतियों के लिए तैयार नहीं हैं। होना तो यह चाहिए था कि बजट में एक समृद्ध और खुशहाल राज्य के सपने को पिरोया जाता, कुछ कड़े फैसले होते और वित्तीय अनुशासन को महत्व दिया जाता, ऐसा करने से जनता नाराज होती और आगामी आम चुनाव में वोट बैंक खिसकता जो सत्ताधारी गठबंधन को मंजूर नहीं था।

यह भी तय है कि राज्य की जैसी मौजूदा आर्थिक हालत है, उनमें कोई राहत तो दी नहीं जा सकती थी, इसलिए सरकार ने आगामी आम चुनाव के मद्देनजर गजब की चाल चली।

चाल ऐसी कि सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे। ऐन बजट के वक्त पंचायत चुनाव घोषित करके आचार संहिता को ढाल बना लिया। अब सरकार के सामने यह तर्क था कि आचार संहिता के चलते हमारा वित्तमंत्री बंधे हाथ का बाक्सर था। वह चाहकर भी कुछ कर न सका। हमारे वित्तमंत्री कितने मजबूर हैं यह बात प्रेस कान्फ्रैंस में उनकी स्वीकारोक्ति से समझी जा सकती है। उन्होंने कहा-टैक्स तो लगाना चाहता था, पर यह मेरे अकेले के बूते की बात नहीं है।

वित्तमंत्री की मजबूरी इस लाइनों से समझी जा सकती है-

मेरे नसीब में थी दोस्तो किताब गलत कहीं सवाल गलत था कहीं जवाब गलत

सरकार में अगर दृढ़ इच्छा शक्ति होती तो वह पंचायत चुनाव आगे सरका कर एक दमदार बजट पेश करती। बजट में हमारे मौजूदा वित्तमंत्री की बेहतरीन छवि और सरकार के इरादे नजर आते, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। पंजाब को चलाने वालों ने राज्य को सालभर के लिए इंच-इंच सरकने के लिए उसके हाल पर छोड़ दिया। अब आने वाले समय में आप इनके चुनावी भाषणों को सुनने, मुंगेरी लाल के हसीन सपने देखने और खुद को ताली बजाने के लिए तैयार कर लीजिए। सवाल यह है कि वित्तमंत्री की ओर से सदन में पेश वित्तीय दस्तावेज को बजट कैसे कहा जाए।

होना यह चाहिए था :

उम्मीद थी कि बजट के प्रावधान पंजाब को बदहाली से उबारते, लेकिन ऐसा हुआ नहीं। पंजाब इस समय गंभीर आर्थिक संकट में है। राज्य को ‘डैथ ट्रैप’ से बाहर निकालने के लिए बुनियादी ढांचे (इन्फ्रास्ट्रक्चर) के विकास के लिए ठोस प्रावधान किए जाने चाहिए थे। राज्य के किसी भी कोने में चले जाएं, सड़कों की हालत दयनीय है। टूटी-फूटी सड़कें विकास में बाधक बनी हुई हैं।

बिजली आज के दौर की सबसे बड़ी जरूरत है। राज्य के सर्र्वागीण विकास के लिए सरकार को पूंजी निवेश की दरकार है। बाहरी निवेशक पंजाब में पैसा लगाने से तब तक कतराते रहेंगे जब तक उन्हें पर्याप्त बिजली की गारंटी नहीं मिलेगी।

फसलों का विविधीकरण :

पानी की ज्यादा खपत वाली फसलों की पैदावार पर जरूरत से ज्यादा जोर देने के कारण पंजाब को गंभीर समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। ऐसे में बहुत जरूरी था कि फसली चक्र में बदलाव के लिए ठोस कार्ययोजना पेश की जाती। पंजाब के किसानों को डेयरी, मछली पालन, हार्टिकल्चर, हाई वैल्यू क्रॉप्स जिनमें फूलों, सब्जियों तथा औषधीय पौधों की पैदावार के लिए प्रेरित करने के लिए ठोस प्रावधान की जरूरत थी।

औद्योगिक ढांचे को राहत नहीं :

कड़ी प्रतिस्पर्धा के दौर में औद्योगिक इकाइयों का आधुनिकीकरण समय की मांग है। इंडस्ट्री में जान फूंकने के लिए वित्तीय मदद की जरूरत थी। बजट का लब्बोलुआब इन पक्तियों में सिमट सा गया है।

खुली आंख की नींद सब सो रहे हैंनजारे कहां रह गए हैं नजारे





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