मार्ग दुर्घटनाएं समाचार होती हैं, जिन्हें हम अनजाने भय के साथ पढ़ते हैं। एक दिन बाद ही वे आंकड़े में बदल जाती हैं, बशर्ते उस हादसे का शिकार बना शख्स हमारा कोई नजदीकी न हो। कुछ हफ्ते पहले दिल्ली में एक भयानक दुर्घटना हुई। रात को तेज गति से जा रही स्कोडा नियंत्रण खो एक पेड़ से टकरा गई। आगे बैठे दोनों शख्स सीट बेल्ट बांधे हुए थे। अत: भीषण टक्कर के बावजूद बच गए, जबकि पीछे की सीट पर बैठी सवारी सीट बेल्ट नहीं बांधी थी, नतीजतन टक्कर के प्रभाव से वे आगे आकर गिरीं और वहीं दम तोड़ गईं। मरने वालों में एक 19 साल की लड़की मेरी भांजी थी, जबकि उसके साथ बैठा लड़का 23 वर्ष का था।
अगले दिन मीडिया बिगड़ैल और रईस संतानों पर नैतिकता प्रधान बातें कर रहा था कि किस तरह वे देर रात तक पार्टी कर मदहोशी में लापरवाही से गाड़ी चलाते हैं। यद्यपि कार के आगे बैठा लड़का जो बच गया था और मेरी भांजी जो दुर्घटना में मारी गई थी का संबंध ठीक-ठाक जिंदगी जी रहे मध्य वर्ग से था। इन दोनों के अभिभावक उच्च शिक्षा प्राप्त हैं या गैर सरकारी संगठनों के साथ काम कर रहे हैं।
लड़कों ने एक या दो बीयर पी थी, जबकि लड़की ने किसी तरह का कोई नशा नहीं किया हुआ था। वे बिगड़ैल रईस नहीं थे, अन्यथा उनके पास अपनी कार होती। अगर आप मानें तो नियति, न मानें तो ये उनका दुर्भाग्य था कि उन्होंने उस युवक से लिफ्ट ली जो बाद में नशे की गिरफ्त में जा फंसा। जब उस लड़के ने कार की गति बढ़ाई तो लड़की रोने लगी। वह लगातार गिड़गिड़ा रही थी कि कृपया गाड़ी धीरे करो-धीरे करो। वह बदस्तूर कहती रही कि अगर तुम ऐसे ही गाड़ी चलाते रहे तो हम सबको मार डालोगे। उसने ऐसा ही किया।
दो दुखी परिवारों के लिए तो तब तक बहुत देर हो चुकी थी, जबकि हम जैसे अन्य लोगों ने इस दुखदायी घटना से क्या सबक सीखा? किसके साथ जा रहे हो वह किस हालत में है इसका ध्यान रखो? भले ही पिछली सीट पर बैठो, लेकिन सीट बेल्ट हमेशा बांधकर बैठो?
दुर्भाग्य से ये दोनों ही बातें सावधानियां हैं, गारंटी नहीं। मुझे याद है कि मेरे एक दोस्त की मां डिवाइडर पर खड़ी सड़क पार करने का इंतजार कर रही थी, जब एक बस उसे रौंदती हुई निकल गई। पिछले दिनों मुंबई में ऐसे कई हादसे पेश आए, जिसमें बेकसूर युवा लोगों को जान से हाथ धोना पड़ा। एक 14 माह की बच्ची एक अनाड़ी ड्राइवर की गलती का शिकार बनी, तो एक घटना में अपने बच्चों को स्कूल छोड़ने जा रही युवती पर एक किशोरवय ड्राइवर ने अनियंत्रित गाड़ी चढ़ा दी।
ये दो घटनाएं भी अब हमारे आंकड़ों में शामिल हो चुकी हैं। ये आंकड़े दिन प्रतिदिन बद से बदतर होते जा रहे हैं। इन पर लगाम कसने का कोई भी तरीका कारगर नहीं हो रहा है। यही वजह है कि जब ट्रैफिक पुलिस नशे में गाड़ी चलाने वालों के खिलाफ अभियान छेड़ती है, तो हम चुपचाप उसकी सराहना करते हैं।
कानून से अपनी चतुराई से बच निकलने की ‘कला’ के चलते लाइसेंस का छिनना हमारे यहां कोई बहुत बड़ा मसला नहीं है। आप सिर्फ 500 रुपए में डुप्लीकेट लाइसेंस हासिल कर सकते हैं, वह भी बगैर किसी प्रश्न का उत्तर दिए हुए। ऐसे में जब ट्रैफिक पुलिस गर्व से कहती है कि इस अभियान के तहत पिछले दो माह में उसने 1,257 लाइसेंस रद्द किए, तो समझ नहीं आता कि उसका सही आशय क्या है?
इंग्लैंड की स्थिति यहां के सर्वथा विपरीत है, जहां जितनी बार आप ट्रैफिक नियमों का उल्लंघन करेंगे, आपके खाते में अंक चढ़ते जाएंगे। एक निश्चित सीमा के बाद आपका लाइसेंस निरस्त कर दिया जाएगा। वहां ऐसा इसलिए संभव है, क्योंकि राष्ट्रीय स्तर पर ट्रैफिक विभाग कंप्यूटर से जुड़ा हुआ है। साथ ही, ट्रैफिक पुलिस ऐसे अत्याधुनिक उपकरणों से लैस है, जो पल भर में आपके गाड़ी चलाने के इतिहास को उसके सामने ला देता है।
अपने यहां इसी तरह की व्यवस्था का प्रस्ताव ट्रांसपोर्ट कमिश्नर के यहां लंबित पड़ा है। इसके साथ ही अन्य बहुत कुछ भी लंबित है। सबसे प्रमुख है दिखावा भर होने वाला ड्राइविंग परीक्षण, जिसकी धज्जियां उड़ाकर आप लोगों पर कार चढ़ाने का लाइसेंस प्राप्त करते हैं। भारत के अतिरिक्त, फिर उदाहरण ब्रिटेन का लें, अन्य देशों में जो ड्राइविंग परीक्षण होते हैं, उसमें पहली बार हमारे यहां के दिग्गज ड्राइवर तक फेल हो सकते हैं। ऐसे परीक्षणों से भी अगर संबंधित अधिकारी संतुष्ट नहीं होते हैं, तो लाइसेंस के लिए आवेदन करने वाले शख्स को इस जैसे तमाम और परीक्षणों से गुजरना पड़ता है।
प्रश्न उठता है कि हमारी प्रणाली में ऐसे बदलाव को आखिर किस चीज की जरूरत है? और दुर्घटनाओं के घटित होने का या लोगों के मरने का इंतजार है या फिर परिवारों की बरबादी का इंतजार है? यहां भी स्वाभाविक प्रश्न उठता है कि प्रशासनिक निर्ममता और सुस्ती के लिए क्या अब तक चुकाई गई कीमत कम है?
-लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं।