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शहरीकरण की बढ़ती चुनौतियां

दृष्टिकोण. संयुक्त राष्ट्र संघ के एक ताजा अध्ययन के मुताबिक इस साल के अंत तक दुनिया की आधी आबादी का शहरीकरण हो जाएगा। मानव सभ्यता के इतिहास में यह पहली बार हो रहा है कि उसकी आधी जनसंख्या पिछड़ेपन की परिस्थिति से निकलकर एक उन्नत और अपेक्षाकृत विकसित व्यवस्था में प्रवेश कर रही है। इससे पहले १९५0 में दुनिया की सिर्फ २९.१ प्रतिशत आबादी ही शहरों में रहती थी और अगले २0५0 तक ६९.६ प्रतिशत लोगों का शहरीकरण संभव हो सकेगा।

इन आंकड़ों पर गौर करने से इतना तो साफ हो जाता है कि शहरीकरण की प्रक्रिया काफी धीमी है। उसमें असंतुलन और असमानता भी काफी गहरी है, वरना जिस रफ्तार से विज्ञान और टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में प्रगति हो रही है, उसमें शहरीकरण का दायरा और बड़ा होना चाहिए था और यह प्रक्रिया और तेज होनी चाहिए थी।

जहां तक भारत का सवाल है तो उसके सिर्फ २९ प्रतिशत लोगों को शहरीकरण का लाभ मिल रहा है जबकि ७१ प्रतिशत की विशाल जनसंख्या अभी भी अविकसित क्षेत्रों में रहती है। हम और हमारे नीति-नियंता अर्से से अपने गाल बजा रहे हैं कि ‘भारत’ गांवों में बसता है और वह मूलत: कृषिप्रधान देश है। लेकिन हमेशा इस सचाई से नजरें चुराई गईं कि गांव में रहने वाला जमींदार बेशक धन-संपदा के मामले में संपन्न हो, पर उसकी रोजमर्रा की जिंदगी शहर में रहने वाले एक औसत आदमी से भी गई-बीती है।

उसके पास अनाज पैदा करने के लिए ज्यादा जमीन हो सकती है, घर भी बड़ा हो सकता है, पर उस घर में हमेशा बिजली शायद ही होती हो। उसके बच्चों को पढ़ने के लिए पड़ोस में बेहतर स्कूल नहीं हो सकते। बीमार होने पर उत्कृष्ट चिकित्सा सुविधा तत्काल नहीं उपलब्ध हो सकती और अच्छे मनोरंजन और सुखदायी चीजों तक उसकी बेहतर पहुंच भी नहीं हो सकती।

यहां हमारा इरादा ग्रामीण जीवन की आलोचना करना नहीं है, लेकिन हिंदी की रोमांटिक फिल्मों में जो गांव दिखता है या सुमित्रानंदन पंत की कविताओं में जो गांव झलकता है, वह हकीकत में कहीं नहीं बसता। गांव का जीवन काफी कठिन, खुरदरा, नीरस और एकायामी है, जहां सिर्फ बिजली, सड़क और पानी का ही बुनियादी अभाव नहीं है बल्कि बेहतर शिक्षा, चिकित्सा, मनोरंजन और आधुनिक सुख-सुविधाओं की चीजें भी अनुपस्थित हैं।

भारत यूरोप के छोटे-छोटे देशों की तरह नहीं है कि एक झटके में उसका शहरीकरण कर दिया जाए, बल्कि एक अरब से अधिक की आबादी वाला विशाल देश है। अभी दुनिया की कुल जनसंख्या ६ अरब ४0 करोड़ है, जिसमें ३ अरब ३क् करोड़ शहरी आबादी है। चीन हमसे ज्यादा बड़ी जनसंख्या वाला देश है, लेकिन वहां शहरीकरण की प्रक्रिया भारत के मुकाबले ४0 प्रतिशत है और अनुमान लगाया जा रहा है कि २क्५क् तक उसकी ७क् प्रतिशत जनसंख्या का शहरीकरण पूरा हो जाएगा।

दरअसल अपने यहां शहरीकरण की गति धीमी होने और उसके लाभ का दायरा संकुचित होने के कारण नए तरह की चुनौतियां उभर रही हैं। गांव में काम-धंधे, रोजगार और सुख-सुविधाओं के अवसर सीमित होने के कारण वहां की काम लायक आबादी बड़ी तेजी से शहरों की ओर पलायन कर रही है। इसे गांव-प्रेमी लोग शहरों द्वारा ग्रामीण मानव संसाधनों के शोषण के रूप में भी देखते हैं। लेकिन इस नई आबादी के टिड्डीदल द्वारा शहरों को आच्छादित करने से खुद शहरों का अपना अस्तित्व भी खतरे में पड़ता दिखाई पड़ रहा है।

वे एक बड़े गांव में तब्दील होने की ओर सरक रहे हैं। उनका बुनियादी ढांचा, जो एक निश्चित आबादी को ध्यान में रखकर विकसित किया गया था, इस अनचाहे बोझ से चरमरा रहा है। यही नहीं, इस मसले को लेकर सांस्कृतिक तनाव की स्थितियां भी पनप रही हैं। मुंबई में राज ठाकरे द्वारा उत्तर भारतीयों के खिलाफ मचाए गए उत्पात और उस पर समाजवादी पार्टी द्वारा की जाने वाली राजनीति अभी हाल की घटना है।

यह मूलत: शहरीकरण की समस्या है, जो असमान विकास की कोख से पैदा होती है। हालांकि भारतीय नियोजनकर्ताओं ने अब अपनी विकास संबंधी रणनीति में कुछ परिवर्तन किए हैं, जिसके तहत ग्रामीण विकास पर धन खर्च किए जाने की प्रवृत्ति दिखती है। इस बजट में भी सबसे ज्यादा धन कृषि, ग्रामीण विकास, शिक्षा और स्वास्थ्य को ही आवंटित किए गए हैं।

लेकिन इस आवंटन का लाभ उन क्षेत्रों और लोगों तक ठीक-ठाक कैसे पहुंचे, इसकी कोई ईमानदार रणनीति नहीं दिखाई देती। यदि पिछड़े हुए क्षेत्रों और लोगों को उनके आसपास ही जीवनयापन के बेहतर अवसर मुहैया करवा दिए जाएं, तो गांव से शहरों की ओर पलायन रुक सकता है। समझने वाली बात शहरी आबादी के साथ-साथ ग्रामीण क्षेत्रों और उनके वासियों को समान अवसर उपलब्ध कराने की है। इसके लिए शहरीकरण की प्रक्रिया ग्रामीण अंचलों तक ले जानी होगी तो कृषि योग्य उपजाऊ जमीनों की बजाय बंजर भूमि का व्यवसायीकरण किया जा सकता है।

दरअसल, ग्रामीण क्षेत्रों में एसईजेड और मॉल की जगह कृषि आधारित उद्योगों और दस्तकारी शिल्प वगैरह का संजाल खड़ा करने और उसे लगातार प्रोत्साहित करने से काम काफी आसान हो सकता है। शहरीकरण की प्रक्रिया का अध्ययन करने वाले विशेषज्ञ भी इस बात पर लगभग एक मत हैं कि आने वाले समय में बड़े-बड़े महानगरों की बजाय पांच लाख से कम आबादी वाले शहरों में ही ज्यादा ‘चमत्कार’ दिखाई पड़ेंगे।

ग्रामीण कस्बों के छोटे-छोटे शहरों में तब्दील होने की प्रक्रिया ज्यादा तेजी से आगे बढ़ेगी। लेकिन इस प्रक्रिया का आग्रह एकरूपता और समरूपता को बढ़ावा देने का है, जो समाज में और संपूर्ण मानवजाति में स्वाभाविक रूप से व्याप्त ‘विभिन्नता’ के आग्रहों को दयनीय बनाने या उसे नष्ट करने का प्रयास करती है।





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