संपादकीय. सत्तासीनों के लिए उपलब्ध सरकारी आवासों के रख-रखाव और साज-सज्जा पर ‘माले मुफ्त दिले बेरहम’ के अंदाज में करोड़ों रुपए खर्च किया जाना अब सामान्य हो चला है। हर साल एक ही बंगले पर होने वाला विशाल खर्च जहां राजनेताओं की शाही जीवनशैली का प्रतीक होता है, वहीं सरकारी तंत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने वाला भी होता है।
चाहे वह देश की राजधानी दिल्ली हो या प्रदेशों की राजधानियां। मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री व मंत्रियों के सरकारी आवासों पर हर साल लाखों रुपए खर्च होते हैं। कुछ हद तक तो इन सत्तासीनों की सुरक्षा व्यवस्था की दृष्टि से इन आवासों में अतिरिक्त निर्माण अपरिहार्य होते हैं, लेकिन ज्यादातर खर्च स्टेटस सिंबल तथा विलासितापूर्ण सुविधाएं मुहैया कराने में होता है।
लोकतांत्रिक व्यवस्था में सरकार में बैठे जनप्रतिनिधियों से सादगीपूर्ण जीवनशैली तथा आचरण की अपेक्षा की जाती है। ऐसे में अब यह अपेक्षा दिनोंदिन बेमानी हो चली है। खर्च के जो आंकड़े उपलब्ध होते हैं, वे इस नाते भी चौंकाने वाले होते हैं कि एक ही बंगले पर इतनी राशि खर्च हो जाती है कि वह बंगले की लागत से कई गुना बैठती है। जाहिर है बंगले में रहने वालों की पसंद-नापसंद के आधार पर साज-सज्जा बदलती रहती है और लोकनिर्माण की जन उपयोगी योजनाओं पर खर्च हो सकने वाली बड़ी राशि वीआईपी आवासों पर झोंक दी जाती है।
इस प्रक्रिया में केवल मंत्री ही शामिल हों, ऐसा नहीं है। नौकरशाहों के सरकारी आवास भी ऐसी ही फिजूलखर्ची के सबब बने हुए हैं। दिलचस्प यह है कि आवंटन और स्वीकृति जैसी सरकारी जटिल प्रक्रिया से ये खर्चे मुक्त होते हैं और वीआईपी के नाम पर नियम-कायदों को ताक पर रखना भी आसान होता है। इसी के चलते सरकारी तंत्र में भ्रष्टाचार की जडं़े मजबूत होती हैं और वीआईपी बंगलों के नाम पर होने वाले खर्च की जवाबदेही भी सामान्य तौर पर तय नहीं होती।
ऐसा भी देखा जाता है कि राजनेताओं और नौकरशाहों को खुश करने की जुगत में अधिकारी ही अनावश्यक निर्माण व साज-सज्जा के उपक्रम को प्रोत्साहित करते हैं। जनता के वोटों से चुनकर जनसेवा के लिए सत्ता में आए राजनेताओं को यह अहसास होना चाहिए कि उनकी सुख-सुविधा व विलासिता पर खर्च होने वाला पैसा आम जनता की गाढ़ी कमाई से आता है और इस मद में मितव्ययता बरतते हुए भी वे जनसेवा को अंजाम दे सकते हैं।