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Chhattisgarh
Bilaspur Bilaspur बिलासपुर. बिलासपुर रेल मण्डल ने 39 साल से कुलियों की भर्ती नहीं की है। उम्रदराज हो चुके कुलियों का स्थान या तो उनके पुत्र ले रहे हैं या फिर अन्य रिश्तेदार। परिवारवाद के इसी क्रम में बिल्ला बेचने का खेल भी कई सालों से चल रहा है।
बिलासपुर रेल मंडल ने सन् 1968 में 182 कुलियों की भर्ती की थी। इन सभी लोगों को रेलवे स्टेशन में यात्रियों का सामान ढोने व माल ढुलाई करने के लिए वैधता प्रदान करते हुए लाइसेंस व बिल्ला जारी किया गया था। इसके बाद आज तक कुलियों की भर्ती नहीं की गई। रेलवे द्वारा बनाए गए बिल्ला ट्रांसफर के नियम और दोबारा भर्ती नहीं किए जाने से स्थिति यह हो गई है कि यदि कोई अन्य व्यक्ति कुली का काम करना चाहे भी तो नहीं कर सकता।
कुली वही व्यक्ति बन सकता है, जो पूर्व कुली का पुत्र है या फिर करीबी रिश्तेदार। रेलवे के इस नियम से पुत्र गोद लेने व बिल्ले की खरीदी-बिक्री कीबातें भी सामने आती रही हैं। यहां के कुलियों के बताए अनुसार उन्हें एक दिन में 50 से 200 रुपए तक की आमदनी हो जाती है। इससे उनके परिवार का गुजारा बड़ी मुश्किल से चल पाता है। वे बताते हैं कि पहले रेलवे की पार्सल ढुलाई का पूरा काम कुली ही करते थे, जिससे आमदनी ठीक थी, लेकिन अब यह काम ठेके पर दे दिया गया है, जिससे उनकी कमाई कम हो गई है।
अब 182 कुलियों में आधे से भी कम लोगों को पार्सल ढुलाई का काम मिल पाता है और इसके बदले रोज मिलने वाला मेहनताना भी मात्र 88 रुपए है। इसके बावजूद भी ऐसे लोगों की कमी नहीं है, जो किसी भी तरह बिल्ला लेकर कुली बनना चाहते हैं।
क्या है बिल्ला ट्रांसफर का नियम: अपनी बीमारी या अधिक उम्र के कारण सामान ढोने में अक्षम लाइसेंसधारी कुली अपने भाई, पुत्र, भतीजे या किसी करीबी रिश्तेदार को अपना बिल्ला ट्रांसफर कर सकते हैं, लेकिन इसके लिए उन्हें रेल प्रशासन से अनुमति लेनी होगी। कुलियों को रेलवे द्वारा चिकित्सा सुविधा की पात्रता दी गई है। इसके अलावा कुली व उसकी पत्नी को यात्रा के साल में एक रियायती यात्रा पास (पीटीओ) दिया जाता है।