bhaskar Web English
HomeVichaar Vichaar

परप्रांतियों के नाम पर महाराष्ट्र का आत्मघाती गोल

पिछले दो महीनों में तमाम उत्तरभारतीय श्रमिक महाराष्ट्र से पलायन कर चुके हैं। पुणो, नासिक, थाणो और मुंबई के उद्योगपतियों ने महाराष्ट्र में अपनी विस्तार योजनाओं को ठंडे बस्ते में डाल दिया है और वे दूसरे राज्यों में अपनी फैक्टरियां लगाने की संभावनाएं तलाशने लगे हैं।

एक मराठी उद्योगपति ने बताया कि उसे मुंबई में अस्सी और नब्बे के दशक के उस बुरे दौर की वापसी की आशंका सता रही है, जब दत्ता सामंत के आक्रामक श्रमिक आंदोलन ने बाल ठाकरे के साथ मिलकर तमाम ऑफिस की नौकरियों को मुंबई से बेंगलूर और गुड़गांव की ओर तथा श्रम शक्ति को तमिलनाडु और गुजरात की ओर खदेड़ दिया था। इस तरह देखा जाए तो राज ठाकरे ने अब एक आत्मघाती गोल ठोंक दिया है।

मुक्त बाजार में निवेश सबसे आकर्षक ठिकाने की ओर ही बहेगा। किसी भी ठिकाने को अनुशासित, मेहनती लोगों की उपलब्धता ही कुछ हद तक आकर्षक बनाती है। हर जगह यही देखा गया कि आप्रवासी, स्थानीय लोगों की अपेक्षा ज्यादा भूखे, ज्यादा मेहनती और कहीं अधिक नवप्रवर्तनशील होते हैं। इसी वजह से हार्वर्ड के रिचर्ड फ्रीमैन जैसे अर्थशास्त्रियों ने दर्शाया है कि अप्रवास को प्रोत्साहित करने वाले समुदाय ऐसा न करने वाले समाजों की बनिस्बत कहीं बेहतर प्रदर्शन करते हैं।

यही वजह है कि विशेषज्ञ मानते हैं अमेरिका इक्कीसवीं सदी में भी प्रतिस्पद्र्धी बना रहेगा और वैश्विक जीडीपी में इसका हिस्सा २२ फीसदी तक बरकरार रहेगा, जबकि यूरोप और जापान में गिरावट आएगी। अप्रवासियों के देश के तौर पर अमेरिका आगंतुकों को संभालने के लिए कहीं अधिक सक्षम है, जबकि यूरोप और जापान बाहरी लोगों को आश्रय देने में ऐतिहासिक तौर पर असफल साबित हो चुके हैं। बुजुर्गो की बढ़ती आबादी और श्रम शक्ति के सिकुड़ने से यूरोप और जापान को चीन तथा भारत जैसे देशों से मात मिलेगी।

हालांकि मराठी मजदूरों के साथ एक जायज समस्या जरूर है। वे उत्तर भारत से आने वाले कहीं अधिक सक्षम लोगों का मुकाबला कैसे कर सकते हैं? हम गतिशील राष्ट्र हैं, विशेषकर गरीब तबका, रोजगार और बेहतर जिंदगी की तलाश में दूसरे शहरों में जा रहा है। इसके चलते एक भारतीय पहचान भी गढ़ी जा रही है और यह धीरे-धीरे क्षेत्रीय पहचानों को मिटा देगी। राज ठाकरे यह जानते हैं कि वे इस अपरिहार्य परिस्थिति को रोक नहीं सकते। यदि उन्होंने हिंसक तरीकों से इसे रोकने की कोशिश की, तो वे कानून-व्यवस्था को बिगाड़ देंगे।

इसके चलते न सिर्फ महाराष्ट्र से निवेश निकल जाएगा, वरन भविष्य में मराठियों के लिए रोजगार के अवसर भी कम हो जाएंगे। उनका यह कदम आत्मघाती साबित होगा। इस प्रकार वह फंस गए हैं। बाहर से आए कहीं अधिक मेहनती और उत्पादक कामगारों के खिलाफ स्थानीय मजदूरों की बदहाली का एक ही जवाब है कि अपने राज्य को निवेश के लिहाज से और आकर्षक बनाया जाए। बेहतर अधोसंरचना निर्मित की जाए, बेहतर स्कूल और कॉलेज खोले जाएं। एक बार यह हो जाए फिर इस राज्य में और ज्यादा रोजगार तथा निवेश आएगा। निस्संदेह ज्यादा बाहरी लोग भी आएंगे, लेकिन पहले से कहीं ज्यादा मराठियों को भी रोजगार मिलेगा।

हालांकि राज ठाकरे की महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के समर्थकों द्वारा जो उत्पात मचाया गया, उसके संदर्भ में एक सवाल ज्यादा चिंताजनक है। आखिर किस वजह से सामान्य, भद्र मराठी युवा, आक्रामक और दुष्ट भीड़ में तब्दील हो गए? यही सवाल जर्मनवासी पिछले ७५ वर्षो से करते चले आ रहे हैं- ‘तीस और चालीस के दशक में हम क्रूर नाजियों में कैसे तब्दील हो गए?’ ऐसा ही कुछ पिछली सदी में अलग-अलग महाद्वीपों, संस्कृतियों और क्षेत्रों के लोगों द्वारा किए गए समस्त सामूहिक नरसंहारों के लिए भी कहा जा सकता है। किन्हीं खास परिस्थितियों में ये हत्यारे, ‘आपके पड़ोसी, अभिभावक या बच्चे’ कोई भी हो सकते हैं।

चींटी से लेकर चिंपाजी तक समस्त सामाजिक प्राणियों की तरह हम भी अपनी जमीन को बचाना चाहते हैं। हम अपने समूह के लिए तो परोपकारी हो जाते हैं लेकिन बाहरी लोगों के प्रति आक्रामक। इस तरह के आत्मघाती कदम उठाने वाले राज ठाकरे अकेले नहीं हैं। मलेशिया में ‘भूमिपुत्र’ आंदोलन वहां से निवेश बहाकर अन्य दक्षिण एशियाई देशों की ओर ले जा रहा है। कुछ साल पहले जर्मनी भारतीय सॉफ्टवेयर इंजीनियरों को अपनी ओर खींचने में असफल रहा और वह भी आकर्षक ‘ग्रीन कार्ड’ योजना के बावजूद।

एक बार लोग यह समझ जाएं कि आप्रवासियों के जरिए उनके समाज की और उन्नति होगी, वे बाहरी लोगों की मनोग्रंथि से निजात पा लेंगे। यदि सारे मराठी सचिन तेंडुलकर की तरह खुद को सबसे पहले भारतीय और बाद में महाराष्ट्रियन मान लें, तो वे खुशहाल हो जाएंगे। इस प्रतिस्पर्धी दुनिया में यह स्वीकारने के लिए परिपक्वता और भाग्य चाहिए कि आप्रवासी समाज को सफल बनाते हैं।





अपने विचार यहां लिखें
नाम:
ईमेल आईडी:
भाषा चुनॆ
हिन्दी रॊमन‌ हिन्दी फॊनॆटिक English
विचार:
कोड: