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पीड़ित पर ही अंगुली उठाना बंद हो

दृष्टिकोण. दूरदराज इंग्लैंड की मूल निवासी फिओना गोवा में रहकर पोनी ट्रैकिंग व्यवसाय शुरू करना चाहती हैं। पोनी ट्रैकिंग के बारे में मेरी राय अलग है, लेकिन मैं उन हालात को अच्छे से समझ सकता हूं, जिसमें एक 43 वर्षीय महिला जिसके पांच अलग-अलग पतियों से नौ बच्चे हैं और जो खुद दूसरों की कृपा से जीवन बसरकर रही थी, अच्छे मौसम और मिलनसार लोगों के बीच गोवा सरीखे तटीय शहर में बसना चाहती है।

आखिरकार गोवा को धरती का स्वर्ग यूं ही नहीं कहा गया है। इसके बावजूद इस खूबसूरत शहर का एक स्याह पहलू भी है, जिसके बारे में रीमो अपने गीतों और लोग फुसफुसाहट के अंदाज में बताते रहते हैं। मादक पदार्थो, भड़कीली पार्टियों, सामने न आने वाले बलात्कार, हत्याएं जिनकी रिपोर्ट तक दर्ज नहीं होतीं, क्योंकि पुलिस को आसानी से खरीदा जा सकता है, इस गोवा का स्याह पहलू है।

रूसी माफिया द्वारा बड़े पैमाने पर जमीन की खरीद-फरोख्त की चर्चा है, तो इजरायली नशे के सौदागर, उज्बेकिस्तान की वेश्याओं और चीनी अपराधियों द्वारा अपराध, भ्रष्टाचार और सस्ते उत्पादों के घालमेल की आवाजें भी कानों में सुनाई पड़ती रहती हैं। इसमें कितनी सचाई है इसे कोई नहीं जानता, लेकिन गोवा के सुरम्य तटों पर विदेशियों की चहल-पहल कोई भी देख सकता है। ये गोवा में यादगार समय बिताने के बाद हमेशा के लिए वहीं बस जाना चाहते हैं, बिल्कुल फिओना की तरह।

स्कारलेट मर चुकी है, लेकिन मुझे दुख इस बात का है कि उसके हत्यारों को पकड़ने की बजाय हरएक शख्स फिओना की परवरिश की खामियों पर चर्चा में लगा है। पुलिस रिपोर्ट दावा करती है कि स्कारलेट ने नशा किया था, जबकि फिओना इसका खंडन करती है। पुलिस ने पहले दावा किया कि स्कारलेट की मौत डूबने से हुई। इसके बावजूद जब फिओना ने हार नहीं मानी और अपनी बात पर डटी रही, तो दूसरी बार पोस्टमार्टम किया गया, उससे पता चला कि स्कारलेट के साथ नृशंसतापूर्वक बलात्कार किया गया और फिर उसे मरने के लिए छोड़ दिया गया था। इस घटना का एक चश्मदीद गवाह भी है, जो स्वयं एक पर्यटक है और वह इतना डरा हुआ है कि गवाही तक के लिए वापस नहीं आना चाहता।

ऐसे में सार्वजनिक जांच-पड़ताल का केंद्र 15 वर्षीय लड़की की नृशंस हत्या रूपी अपराध होना चाहिए, न कि उसकी जीवनशैली और उसकी मां की पृष्ठभूमि। हरएक बलात्कार या छेड़खानी की घटना के प्रति हमारा यही रवैया रहता है। हम इसी नजरिये से उसे देखते हैं। इसी तरीके से यौन अपराधी कानून के चंगुल से बच निकलने की जुगत में रहता है। शोषित या पीड़ित के चरित्र पर अंगुली उठाकर ऐसे सवाल उछाले जाते हैं, जो बलात्कार और छेड़खानी को अवश्यंभावी करार देते प्रतीत होते हैं। मकसद यही होता है कि हम यकीन कर लें कि जो लड़की नशा करती थी या जिसने कमसिन उम्र में ही यौन संबंध बना लिए, वह इसी की हकदार थी, क्यों?

परंपरागत नजरिये से देखें तो एक महिला जिसके चरित्र पर संदेह हो सकता है, को हम इस अधिकार से क्यों वंचित कर देना चाहते हैं कि वह किसके साथ यौन संबंध बनाए? खासकर जब एक वेश्या तक को यह अधिकार है कि वह किसके साथ संबंध रखे और किसके साथ नहीं। संदिग्ध चरित्र की महिला से बलात्कार का अपराध किशोरवय की लड़की से किए गए बलात्कार से कम नहीं होता। अंतर खाली हमारी-आपकी सोच का है, जिसे बचाव पक्ष के वकील और भ्रष्ट पुलिसवाले अपने हित साधने में इस्तेमाल करना चाहते हैं।

यही कुछ फिओना के साथ हो रहा है। अपराध की बजाय चर्चा का केंद्र पीड़ित शख्स की व्यक्तिगत जीवनशैली और उसकी मां की अभागी पृष्ठभूमि बना दी गई है। क्या फर्क पड़ता है यदि स्कारलेट नशा करती थी? लाखों अन्य किशोरवय के लोग भी नशा करते हैं। क्या फर्क पड़ता है कि स्कारलेट ने 15 वर्ष की उम्र में यौन संबंध बना लिए थे? यहां-वहां लाखों किशोर ऐसा कर रहे हैं। सिर्फ इस बात से उनकी हैसियत या प्रभाव कम नहीं हो जाता। इसका यह अर्थ तो कदापि नहीं है कि जो चाहे वह उन्हें हासिल कर सकता है।

अपने अन्य बच्चों के साथ कर्नाटक जाते वक्त फिओना यदि स्कारलेट को उसके दोस्त के साथ छोड़ गई थी, तो इससे भी क्या फर्क पड़ता है? अगर लापरवाह परवरिश की बात एकबारगी मान भी ली जाए तो क्या इसका अर्थ यह निकलता है कि फिओना इसी की हकदार थी? क्या फर्क पड़ता है कि वह इंग्लैंड में दूसरों के रहमोकरम पर जीती है? क्या इसका मतलब यह निकलता है कि वह बेपरवाह है और उसे अपने बच्चों से प्यार नहीं है, उनकी चिंता नहीं है? क्या फर्क पड़ता है कि फिओना के कई प्रेमी रहे और उसके नौ बच्चे हैं? यहां मायने रखती है स्कारलेट की नृशंस हत्या, जिस पर पुलिस लीपापोती करने में जुटी है।

‘पर उपदेश कुशल बहुतेरे’ वाली बात पर मुझे गुस्सा आता है और हम सभी को आना भी चाहिए। हर व्यक्ति दूसरे का आकलन कर रहा है, वह भी गलत बातों के लिए। इसी वजह से अपराध के मामलों में तेजी आई है। हर तरह के अपराधी सिर्फ इसलिए बच निकलते हैं, क्योंकि हमारे पास व्यक्तिगत जिंदगी से जुड़ी फिजूल की बातों पर एक-दूसरे पर अंगुली उठाने से ही फुर्सत नहीं है। क्या बेवकूफी है कि गोवा पुलिस फिओना पर लापरवाही का मामला दर्ज करने की सोच रही है, जिसमें उसे तीन वर्ष की सजा या एक लाख रुपए का जुर्माना हो सकता है।

महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों से निपटने के क्रम में पहले पीड़ित पर अंगुली उठाना बंद करना होगा और अपराधियों को सजा दिलाने की कोशिशें शुरू करनी होंगी और कुछ नहीं तो स्कारलेट की मौत तो यही सबक सिखाती है। साथ ही आशा की जा सकती है कि फिओना इंग्लैंड की सर्दी और आक्रामक मीडिया से बचने के लिए गोवा में ही रह जाएंगी। मीडिया तो उनसे सहानुभूति कम, उनकी लापरवाही सिद्ध करने के लिए आतुर खड़ा है।





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