संपादकीय. देश के दस राज्यों में लगभग 180 जिले नक्सलवाद की गिरफ्त में हैं। इस तरह से देखने पर समस्या विकराल लग सकती है, पर यदि केंद्रीय सरकार की मानें, तो वास्तव में इस पर बहुत चिंता करने की जरूरत नहीं। इस आशय का बयान केंद्रीय गृहमंत्री शिवराज पाटिल ने संसद में बुधवार को दिया और उनका यह भी कहना था कि नक्सलवाद की समस्या को बहुत बढ़ा-चढ़ाकर नहीं प्रस्तुत करना चाहिए, क्योंकि इससे लोगों में भय फैलता है।
सरकार द्वारा दिए गए आंकड़ों के हिसाब से देश के 6.5 लाख गांवों के केवल दो प्रतिशत यानी 14,000 गांवों में इस समस्या का प्रभाव है और देश में सभी आतंकी और अलगाववाद की घटनाओं में केवल 1.1 प्रतिशत नक्सलवाद से संबंधित हैं। सही है कि आंकड़े किसी छोटी समस्या को विकराल दिखा सकते हैं और किसी भी भयंकर समस्या को मामूली ठहरा सकते हैं।
नक्सलवाद की समस्या शायद अब इस श्रेणी में नहीं आती, जिसे मामूली कहा जाए। भले ही जिले, गांव या पुलिस थानों की संख्या के हिसाब से यह समस्या छोटी लगे, पर सच तो यह है कि छत्तीसगढ़, आंध्रप्रदेश, उड़ीसा, झारखंड और बिहार प्रमुख रूप से और उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश व उत्तराखंड कुछ कम स्तर पर इस समस्या से जूझ रहे हैं। पिछले दिनों प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी कहा कि नक्सलवाद इस समय देश के सामने सबसे बड़ा आंतरिक खतरा है।
छत्तीसगढ़ के बारे में केंद्र ने भी माना है कि यह राज्य नक्सलवाद से गंभीर रूप से पीड़ित है। केंद्र ने छत्तीसगढ़ शासन को बड़ी संख्या में सुरक्षाबल, बख्तरबंद गाड़ियां, हेलीकॉप्टर और शस्त्र खरीदने के लिए धन देने का भी दावा किया है। ऐसा कई बार कहा जा चुका है कि नक्सलवाद और इस प्रकार के सामाजिक असंतोष से जुड़ी समस्याओं को केवल कानून और व्यवस्था की समस्या मानकर नहीं सुलझाया जा सकता।
बेहतर प्रशासन, विकास योजनाएं और स्थानीय लोगों का विश्वास जीतकर सरकार और पुलिस लोगों को अपने साथ जोड़ सकती है। फिर देश की विभिन्न एजेंसियों में काम कर रहे अधिकारियों के पास पिछले उदाहरण भी हैं, जिनके आधार पर पुरानी भूलों को दोहराने से बचा जा सकता है। किसी समस्या की विस्तृत चर्चा सिर्फ इसलिए न की जाए कि इससे लोगों में भय और असुरक्षा की भावना बढ़ती है, यह उस समस्या से निपटने का सबसे अच्छा तरीका नहीं कहा जा सकता। खासतौर पर तब, जब समस्या के पीछे अपराध नहीं, बल्कि सामाजिक कारण हैं जो तुरंत निराकरण चाहते हैं।