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राजनीति में सबकुछ जायज

विशेष टिप्पणीराजनीति में सबकुछ जायज है। सभी एक थैली के चट्टे-बट्टे हैं। यहां नैतिकता और जवाबदेही के लिए कोई जगह नहीं है। चाहे पक्ष हो या विपक्ष जनता की परवाह किसे है। सभी अपनी सुविधा के अनुसार मोहरे आगे बढ़ाते हैं और चालें चलते हैं। जनता की हालत इन पंक्तियों से समझी जा सकती है -

है जो कुछ पास अपने, सब लिए सरकार बैठे हैं जो चाहें आप ले जाएं, सरे बाजार बैठे हैं

विधानसभा में बुधवार को पंचायती राज संस्थाओं के चुनावों को सर्वसम्मति से स्थगित करने की सिफारिश यकीनन चौंकाने वाली है।

इससे जाहिर होता है कि जनप्रतिनिधि लोकतंत्र को जनता के लिए नहीं, बल्कि खुद के लिए ज्यादा मुफीद मानते हैं। वे वही कदम उठाते हंैं जिसमें उन्हें खुद का फायदा दिखाई देता है। जनता का सेवक नहीं शासक बनना उन्हें अधिक भाता है।

यह बात अलग है कि विधानसभा की सिफारिश को राज्य चुनाव आयोग शेषन की तरह लेता है या नहीं। चुनाव स्थगित करने की सिफारिश के लिए सर्वसम्मति से जो कारण बताए गए हैं वे पहले से ही मौजूद थे। तब किसी को ख्याल नहीं आया कि अप्रैल माह में गेहूं की कटाई और बच्चों की परीक्षाएं होंगी।

गौर करने वाली बात है कि इसके पहले भी चुनाव अप्रैल माह में होते रहे हैं। दोनों पक्षों ने इससे पहले इस मुद्दे पर सहमति क्यों नहीं जताई? जाहिर है सभी राजनीतिक रोटियां सेकने में व्यस्त हैं। सत्ताधारी गठबंधन ने तो एक तीर से कई निशाने साध लिए हैं। पहले बजट पेश करने के समय पर पंचायत चुनाव घोषित कर दिए गए ताकि कोड ऑफ कन्डक्ट की आड़ में सरकार की खस्ताहाल स्थिति को छिपाया जा सके।

सत्ताधारी दिग्गज यह जानते थे कि सरकार का खजाना खाली है और बजट में कोई ऐसा चमत्कार नहीं कर पाएंगे जो जनता को प्रभावित कर सके । दिशाहीन बजट पेश करने के बाद सरकार को इस बात का आभास हो गया था कि इसका खामियाजा पंचायत चुनाव में भुगतना पड़ सकता है और आगामी आम चुनावों में भी सत्ताधारी गठबंधन की किरकिरी हो सकती है।

अकाली दल का सर्वेसर्वा नियुक्त होने के बाद सुखबीर बादल क ी साख भी इन चुनावों में दांव पर थी, इसलिए सोच समझ कर एक शानदार राजनीतिक पटकथा लिखी गई। सत्ताधारी गठबंधन की मुश्किल कांग्रेस ने और आसान कर दी। जिस खूबसूरती के साथ इस राजनीतिक ड्रामे की पटकथा राज्य के दिग्गज सत्ताधारियों ने लिखी उसे कांग्रेसी नगमानिगारों ने सुपरहिट बनाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी।

कांग्रेस ने पंचायत चुनाव स्थगित करने संबंधी प्रस्ताव पर अपनी सहमति देकर सरकार के दोनों हाथों में लड्डू पकड़ा दिए। होना तो यह चाहिए था कि कांग्रेस बादल सरकार के दिशाहीन बजट को जनता के दरबार में ले जाती और सरकार से जवाब मांगती कि राज्य के उज्‍जवल भविष्य के लिए उसने क्या किया। अब भले ही कांग्रेसी यह कहें कि पंचायत चुनाव प्रक्रिया उसे पसंद नहीं थी और सरपंचों का चुनाव पंचों के जरिए कराने पर उसे आपत्ति थी। लेकिन एक सच्चई यह भी मानी जा रही है कि कांग्रेस के पास जनता के दरबार में जाने के लिए कोई बड़ा मुद्दा नहीं था, क्योंकि बजट में न तो टैक्स लगाए गए और न ही रियायतें हटाई गईं। हालात कुछ ऐसे थे कि कांग्रेस को बैकफुट में जाने पर कोई नुकसान नहीं दिखाई दिया। अब जो भी हो मौका कांग्रेस के हाथ से निकल चुका है और सत्ताधारी गठबंधन ने कू टनीतिक बाजी मार ली है।

गठजोड़ धर्म में फंसी भाजपा भी इस पूरे ड्रामे को मूकदर्शक की तरह देख रही है। भाजपा ठीक उसी तरह मजबूर है जिस तरह हमारे हाईटेक और तेजस्वी वित्तमंत्री मनप्रीत सिंह बादल मजबूर हैं। बजट से पहले मनप्रीत ने कहा था कि अब समय आ गया है कि या तो रियायत दो या फिर टैक्स भरो। बजट के बाद उन्होंने कहा कि ‘मैं टैक्स लगाना चाहता था, लेकिन यह मेरे अकेले के बूते की बात नहीं थी’ इस शह और मात के खेल में जनता भले ही पैदल बनी रहे इससे जनप्रतिनिधियों को क्या लेना देना, क्योंकि इन तमाम पंैतरेबाजियों का खामियाजा तो अंतत: आम आदमी को ही भुगतना पड़ेगा। कुल मिलाकर हमारे नेताओं को यह समझना होगा कि वक्त आने पर जनता हिसाब चुकता करने से नहीं चूकती। यहां अश्व घोष की यह पंक्तियां सटीक बैठती हैं -

किस कदर खामोश लगती है हवा इस पल मगर वक्त आने पर कभी इसके भी तेवर देखना





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