जीवन दर्शन. दो भाई थे। एक बार किसी बात पर दोनों में विवाद हो गया, जिसमें छोटे भाई ने अपने बड़े भाई को कुछ अपशब्द कह दिए। यह बात बड़े भाई के दिल में बैठ गई। कुछ समय बाद छोटे भाई की पुत्री का विवाह होने वाला था। छोटा भाई विवाह में शामिल होने के लिए बड़े भाई को मनाने पहुंचा, लेकिन बड़े भाई ने पुरानी बातों को याद कर उससे कुछ भी कहने-सुनने से मना कर दिया।
छोटा भाई बड़े भाई के गुरु के पास गया और उनसे अपनी बात कही। गुरु ने बड़े भाई को बुलाया। उससे पूछा - पिछले रविवार को मैंने क्या उपदेश दिया था? बड़े भाई ने कहा - गुरुजी, मुझे याद नहीं आ रहा है। गुरु ने कहा - अच्छी तरह याद करने का प्रयास करो, उसके बाद बताओ। बड़ा भाई बहुत देर तक सोच-विचार करता रहा, लेकिन याद नहीं आया। गुरु ने कहा - जब तुम्हें मेरे कुछ दिन पूर्व के उपदेश याद नहीं आ रहे हैं, तो तुम महीनों पूर्व कहे गए शब्दों को याद कर क्यों अपने छोटे भाई की खुशियों को बढ़ाने की बजाय घटा रहे हो? बड़े भाई ने अपनी भूल मानी और विवाह उत्सव में शामिल हुआ।
व्यक्ति को चाहिए कि वह केवल उन्हीं बातों को याद रखे जो उसे समाज से जोड़ें, उसके व्यक्तित्व को परिष्कृत करें। यदि किसी स्थिति-विशेष में किसी ने कुछ अपमानजनक कह दिया हो या कुछ ऐसा किया हो जो सही न हो, तो वह बात भूल जाना ही उचित है। जो अपने दिलोदिमाग में उन शब्दों को या स्थितियों को बार-बार चिंतन में लाता है वह इसमें न केवल अपना समय नष्ट करता है बल्कि अपने दिलोदिमाग पर इसे बोझ की तरह लेकर जीता रहता है। आवश्यकता है उस व्यक्ति को क्षमा कर इस अनावश्यक बोझ से छुटकारा पा लिया जाए, ताकि सभी से प्रेम व सौहार्द्र का रिश्ता बना रह सके।