विकास मंत्र. शहर की मार्केटिंग सीखना चाहते हैं? हैदराबाद को देखिए। उस हैदराबाद को जिसे चंद्राबाबू नायडू ने ब्रांड के रूप में विकसित करना शुरू किया था और मुख्यमंत्री से ज्यादा उसके ब्रांड मैनेजर बन गए थे। शहर की मार्केटिंग की प्रक्रिया भी किसी उत्पाद या सेवा की ब्रांडिंग से मिलती-जुलती ही है।
शहर उत्पाद और सेवा दोनों है, बल्कि वह और भी बहुत कुछ है। सबसे पहले वह बुनियादी रूप से प्रोडक्ट या उत्पाद है। मिसाल के लिए, पुराना गौरवशाली हैदराबाद। चार सौ सालों से ज्यादा वक्त का इतिहास, नवाबी संस्कृति, आरामतलब रवैया, धर्मपरायण हिंदुओं और नमाजी मुसलमानों की मिली-जुली आबादी। अस्त-व्यस्त यातायात। शराब पर पाबंदी। लड़कियां मिनी स्कर्ट नहीं पहनतीं। तनाव में बीतता हरेक त्योहार, पलक झपकते बंद का एलान और गाहे-बगाहे बसें आग के हवाले। यह था हैदराबाद, दूसरे शहरों की तरह।
लेकिन फिर सोची-समझी रणनीति के तहत इसकी ब्रांडिंग शुरू हुई। अचानक लोगों से बात करने पर उनमें गर्व की भावना महसूस होने लगी। टैक्सी ड्राइवर बताने लगे कि कैसे सड़कें बेहतर हो गई हैं। जगह-जगह फ्लाइओवर बनते दिखाई देने लगे। मुझे लगा बनने में सालों लगेंगे। लेकिन नहीं। तीन महीने बाद मैं हैदराबाद लौटा, तो मैंने चौंककर पूछा वह बेगमपेट फ्लाइओवर का काम बंद हो गया क्या। ड्राइवर ने कहा, नहीं, हम उसी पर चल रहे हैं।
न्यू हैदराबाद की सड़कें तो नई दिल्ली के राजनयिक इलाके की सड़कों से भी चौड़ी हो गईं। शहर को हरा-भरा बनाया जाने लगा। हाईटेक सिटी का निर्माण शुरू हुआ। रामोजी फिल्मसिटी तो बन ही चुकी थी। शहर आधुनिक और इंटेलीजेंट लगने लगा। सिनिक भले ही इसे हायपराबाद कहने लगे हों, लेकिन हैदराबाद ब्रांड बन गया।
-लेखक प्रख्यात मैनेजमेंट कंसल्टेंट हैं।