दृष्टिकोण. नब्बे के दशक के शुरुआती दौर में एयर इंडिया ने भारत के विभिन्न प्रांतों के परंपरागत परिधानों में स्थानीय लोगों की फोटो युक्त एक कैलेंडर जारी किया था। इसमें गोवा को चर्च में शादी करते जोड़े के माध्यम से दिखाया गया था। दुल्हन बेहतरीन वेडिंग गाउन में थी तो वर जैकेट और टाई में। इस कैलेंडर के प्रकाशित होते ही गोवा में असंतोष फूट पड़ा था। स्थानीय लोगों का कहना था कि देश की राष्ट्रीय विमान सेवा प्रदाता कंपनी ने राज्य की गलत छवि पेश की है।
जिस राज्य में साठ फीसदी से अधिक हिंदू रहते हैं, वहां यह कैलेंडर उसे एक पाश्चात्य पुर्तगाली उपनिवेश के तौर पर निरूपित करता था। इन आंदोलनों के आगे झुक कैलेंडर को बदलना पड़ा था। गोवा को समझने में जब एयर इंडिया के महाराजा से गलती हो सकती है, तो हम औसत भारतीय उसे सही ढंग से कैसे समझ सकते हैं? दशकों से गोवा एक तरह की गलत विकृत छवि का शिकार रहा है, जिसके हिसाब से यह मौज मस्ती और आरामतलब लोगों का गढ़ है, जिनके नैतिकता के पैमाने बहुत मजबूत नहीं हैं।
कई सांस्कृतिक बदलाव को जन्म देने वाले बॉलीवुड ने भी गोवा के साथ न्याय नहीं किया। यहां तक कि लीक से अलग हट कर बनी फिल्म ‘दिल चाहता है’ में भी गोवा को मौज मस्ती के समग्र केंद्र के रूप में निरूपित किया गया, जहां तमाम अन्य साधनों के साथ लड़कियां आसानी से उपलब्ध हैं। गोवा की इस छवि को बदल पाना इतना आसान नहीं रहा, खासतौर पर जब मीडिया भी इसी छवि को दोहराता रहा। अगर कुछ साल पहले मछली, फैनी और फुटबॉल गोवा की पहचान समझी जाती थीं तो अब सेक्स, समुद्र तट और हर तरह के पाप उसके मानक मान लिए गए हैं।
इसके लिए स्कारलेट कीलिंग प्रकरण तो मीडिया के लिए एक वरदान बन कर आया। एक किशोरवय की लड़की, नशा, संभावित बलात्कार, हत्या- खून का स्वाद चख चुके मीडिया को भला और क्या चाहिए था? यह घटना जहां घटी, वह स्थान मादक पदार्थो के लिए जाना जाता है।
स्कारलेट भी यौन संबंधों की अभ्यस्थ थी, लड़की की मां के जीवन का पिछला अध्याय स्याह पहलू लिए हुए था, जो अब गोवा के राजनीतिज्ञों और स्थानीय पुिलस में सांठ-गांठ के आरोप लगा रही है। इस सबके होते हुए एक सनसनीखेज अपराध कथा जुटाने की ख्वाहिश लिए मीडिया को क्या वास्तव में दोषी ठहराना उचित है?
इसकी बजाय स्कारलेट की गाथा गोवा की दो बिलकुल अलग-अलग तरह की संस्कृतियों के बीच होने वाले विवाद की ओर इशारा करती है। एक गोवा समुद्र तट पर अठखेलियां करते युवा, सत्तर के दशक के पनपे हिप्पियों, रेव पार्टियां करने वालों का है। लेकिन एक ऐसा गोवा भी है जो जहां सामाजिक परंपराएं गहरे तक पैठी हुई हैं, जहां इसके गावों और चर्चे में लोक संस्कृति की झलक मिलती है, ग्रामीण समुदायों की आम जीवनचर्या, जहां शिक्षा को प्राथमिकता दी जाती है और जिसे अपनी बहुलतावादी सांस्कृतिक विरासत पर बेहद गर्व है। इस बहुसंख्यक गोवावासियों का कभीकभार ही जिक्र होता है चूंकि उनके जीवन के बारे में ऐसा कुछ रोमांचक नहीं है जिसके बारे में बताया जा सके।
वस्तुत:, गोवा का पर्यटन उद्योग इस राज्य को उन्मुक्त सैक्स का स्वर्ग का प्रतीक बनाने के लिए जिम्मेदार है। ऐसा अनुमान है कि हर साल गोवा में पच्चीस लाख पर्यटक आते हैं, जिनमें से ज्यादातर स्थानीय पर्यटक होते हैं और जो इसे ‘मुक्त’ राज्य के तौर पर उभारने के उत्सुक नजर आते हैं। इस राज्य में आने वाले पर्यटकों में से महज बीस फीसदी विदेशी होते हैं, जिनमें से ज्यादातर सस्ती छुट्टियों के लिहाज से आते हैं।
दुर्भाग्य से, गोवा की पोस्टकार्ड छवि का यहां रहने वाले लोगों के जीवन की वास्तविकता से ज्यादा संबंध नहीं है। इसके चलते ही संस्कृतियांे में टकराव होता है जो स्कारलेट के मसले पर चल रही बहस में झलकता है।
ज्यादातर गोवावासियों के लिए विदेशी पर्यटन उनकी सामुदायिक जीवनचर्या में अनावश्यक दखलंदाजी की तरह है। आज भी समुद्रतट पर किसी भी तरह की नग्नता के विचार का गोवावासी विरोध करते हैं। शायद इसी वजह से बहुत थोड़े गोवावासी ही ऐसे हैं, जिन्हें स्कारलेट की मां से कोई संवेदना है। उन्हें इस बात पर अचंभा है कि किस तरह एक मां अपनी किशोरवय पुत्री को अकेला छोड़ कर्नाटक यात्रा पर निकल गई।
बहरहाल कीलिंग के व्यवहार से गोवा की संवेदनशीलता आहत हुई है। इसने परंपरागत समाज के उस डर को उभार दिया है, जो बाहर से आए लोगों से दबा हुआ महसूस करते हैं। एक युवा लड़की के साथ बलात्कार फिर उसकी हत्या पर भी बहुसंख्यक आबादी ने उतनी चिंता नहीं जताई, जितनी जताई जानी चाहिए थी। यद्यपि गोवा की सांस्कृतिक पहचान को पर्यटकों की लाइफ स्टाइल से खतरा नहीं है।
पर्यटक तो राज्य के एक सीमित हिस्से में ही रहते हैं। वास्तव में सीमित रोजगार अवसर वाले राज्य गोवा को और तो अधिक पर्यटकों को आकर्षित करने की जरूरत है। ऐसे में गोवा समाज को इन बाहरी लोगों की बजाय आंतरिक खतरा है। यह खतरा है बहुमूल्य रियल एस्टेट की उन लोगों को बिक्री से, जिन्हें राज्य के भविष्य की रत्ती भर भी परवाह नहीं है। ये लोग नियम-कायदों की धज्जियां उड़ाकर राज्य के पर्यावरणीय ढांचे को नष्ट करने में जुटे हैं।
स्कारलेट मामले में हाय तौबा मचाने वाले गोवा के राजनीतिज्ञों में से कितनों ने भूमाफियाओं के शिकंजे में जाती स्थानीय जमीन के मुद्दे पर आवाज उठाई है? यह हैरानी की बात नहीं है कि राज्य के अस्तित्व में आने के 21 वर्षो में 19 मुख्यमंत्री देख चुके इसके राजनेता सुशासन के मुद्दे पर बात करने का नैतिक अधिकार खो चुके हैं, जबकि औसत गोवावासी के लिए यह चिंता का कहीं अधिक सबब है? ईमानदारी से कहूं तो आज गोवा के सामने चुनौती मीडिया में छाया स्कारलेट प्रकरण नहीं है।
गोवावासियों के समक्ष असली चुनौती है कि वे किस हद तक अपने राज्य की विशिष्टता को बचाए रखने में सफल होते हैं। वे कहां तक गोवा को कंक्रीट का जंगल बनने से रोक पाते हैं। हत्या के किसी मामले सरीखी सुर्खियां पर्यावरण से जुड़ा मसला कभी हासिल ही नहीं कर पाता है। ऐसे में अगर दीर्घकालिक नजरिये से देखा जाए तो पर्यावरण क्षरण को रोकना ही गोवा के भविष्य के लिए एकमात्र हल होगा।
-लेखक सीएनएन आईबीएन के एडीटर इन चीफ हैं।