वाशिंगटन. एक नए अध्ययन के अनुसार, आंखें अपने चोटिल रेटीना का उपचार स्वयं अपनी ही क्षमता के आधार पर कर लेती है, जिससे बाहरी रेटिनल टिश्यू अथवा स्टेम सेलों की मदद की आवश्यकता नहीं पड़ती।
हार्वर्ड मेडिकल स्कूल के डॉन्ग फेंग चेन और उनकी टीम ने अपने शोध के बाद घोषित किया है कि जब ग्लूटामेट और अमीनोएडिपेट जैसे प्राकृतिक तौर पर बनने वाले रसायनों को आंखों में प्रवाहित किया जाता है, मुलर सेल अधिकाधिक संख्या में बंट जाते हैं।
शोधकर्ताओं ने आंख में एक रसायन की खोज की है जो गैर-न्यूरोनल सेलों को प्रोजेनिटर सेलों में बदल देता है जो नए रेटिनल सेलों का गठन कर सकते हैं।
वैज्ञानिक लंबे समय से आंख में मौजूद मुलर सेलों की जानकारी रखते थे, जिसका कार्य रेटिनल टिश्यू की रक्षा करना होता है। परंतु हाल के वर्षो में, जानकारी प्राप्त हुई है कि यह सेल्स कभी-कभार प्रोजेनिटर सेलों की तरह बर्ताव कर सेल साइकिल में पुन: दाखिल हो जाते हैं, जिस दौरान यह अन्य सेलों में बदल जाते हैं।
प्रोजेनिटर सेल स्टेम सेलों की ही तरह होते हैं और यह अन्य सेलों की तरह सीमित मात्रा में ही बदलते हैं। यह शोध परिणाम आने तक वैज्ञानिकों को इस प्रक्रिया के कारणों का ज्ञान नहीं था। इस कारण इन रसायनों को उन्होंने प्रयोगशाला में चूहों पर आजमाया था।