नई दिल्ली. आडवानी ने अपनी किताब 'माई कंट्री माई लव' में लिखा है 2004 में उनकी पार्टी को जब हार का सामना करना पड़ा था तो पार्टी में बहुत मतभेद हो पैदा हो गए थे। पार्टी को सिर्फ 186 सीटें ही मिली थी। हालांकि हार के लिए कोई एक व्यक्ति जिम्मेदार नहीं था। फिर भी हमारी पार्टी इस हार से इतनी आहत हुई कि पार्टी के नेता एक दूसरे पर उगंली उठाने लगे थे।
आडवानी ने अपनी किताब में लिखा है कि ऐसा हमारी पार्टी में कभी भी नहीं हुआ था। हार के बाद नायडू ने व्यक्तिगत कारणों से अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया। नायडू ने लोकसभा चुनाव में हार की जिम्मेदारी भी ली। हालांकि उनके जाने के बाद भी पार्टी में काबिल नेताओं की कमी नहीं थी। सुषमा स्वराज, अरुण जेटली, प्रमोद महाजन और नरेन्द्र मोदी जैसे नेता हमारे पास थेऔर मैं चाहता था कि इनमें से ही कोई अध्यक्ष बने। लेक्न इन नेताओं को लगा कि ऐसे में समय पार्टी को सीनियर नेता की जरुरत है। वे मुझे अध्यक्ष बनाना चाहते थे। लेकिन सही में मेरी इच्छा नहीं थी। लेकिन जब अटल बिहारी वाजपेयी ने मुझसे अध्यक्ष बनने को कहा तो मैं उनको मना नहीं कर पाया। और इस तरह मैं 5वीं बार भाजपा का अध्यक्ष बन गया।
आडवानी ने कहा कि विचारों में मतभेद पर पार्टी में होता है लेकिन जब ये बाते बाहर जाती है तो मुझे बहुत दुख होता है।