Manoranjan
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हिंदी फिल्मी दर्शक का भी एक किस्म का कॅॅरियर होता है। मेरा भी रहा है। आज मैं आपको अपने इस रंगीन कॅरियर की संगीन हीरोइनों के विषय में बताऊंगा। अभी की मेरी तस्वीर देखकर आमतौर पर, और खुद मुझे देखकर विशेषतौर पर शायद अचानक विश्वास नहीं हो, पर मैं भी कभी जवान था। पर जवानी लगभग यूं ही चली गई, क्योंकि हीरोइने तब इतनी घरेलू और गृहकार्य में दक्ष टाइप की होती थीं कि दर्शक के विचार प्राय: पवित्र बने रहते थे और आज जब मैं उस उम्र में लगभग एक टांग धर चुका हूं कि जहां पवित्र के अलावा अन्य कोईविचार उठते ही नहीं, तब अचानक हीरोइन ऐसी निकल आई हैं कि विचारों की पवित्रता आज की प्राय: हिंदी फिल्मों का आनंद लेने में बाधा पहुंचाती है। मेरे साथ हमेशा यही हुआ है कि मैं सही जगहों पर गलत टाइम पर पहुंचा हूं। तब ‘मदर इंडिया’ टाइप के वातावरण में जवानी काट दी और अब बुढ़ापे में ‘मिस इंडिया’ को टाप रहा हूं।
पर हिंदी फिल्मों का वह भी एक युग तो था जनाब। चाहें तो पाषाण युग कह लें। उन दिनों हीरोइनें ऐसी होती थीं कि प्यार करने में ज्यादा उनका आदर करने का मन करता था। भाभीजी टाइप व्यक्तित्व की। पांव तो छूने को दिल न भी करे, पर देखकर आज की भांति ‘हाय - हाय’ करने का मन से विचार भी नहीं आ सकता था। कभी उन पर प्यार आया भी तो बड़े क्षमाभाव से ही प्रकट किया हमने। वे होती ही इस तरह की थीं। आदरणीया तथा श्रद्घेय सी। हिलती जुलती भी कम ही थीं।
मटकने, लटके-झटके की तो बात ही नहीं। पेड़ से टिकी रहतीं। झूला भी झूलती, तो हौले हौले। आंखें मटका दीं, तो जानिए कि प्रेमप्रदर्शन की पराकाष्ठा हो गई। हाथ हिलाकर गर्दन इधर से उधर की दी या बल ही खा लिया, तो हम जैसे दर्शक छाती कूटने लगते थे। उन दिनों अपनी ही छाती कूटने का रिवाज था। नितम्ब तो तब भी हुआ करते थे, पर बेरोजगार से फालतू बैठे रहते थे। तब नितम्ब मात्र बैठने के काम आते थे और हिंदी फिल्म जगत को खबर ही नहीं थी कि हीरोइन के नितम्बों की गतिशीलता तथा उद्यमशीलता का सहारा लेकर फिल्म कहां से कहां जा सकती है। हीरोइन प्राय: साड़ी पहनती थीं और प्यार के दृश्यों में पल्लू को उंगली पर लपेटती हुईतिरछी नजर से देखा करती थी।