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Bilaspur Bilaspur बिलासपुर.
कुछ वर्ष पहले तक रंगों के बगैर होली की कल्पना करना भी संभव नहीं था। हालांकि अब ऐसा नहीं रहा और बाजार में मिलने वाले रासायनिक रंगों के त्वचा व शरीर पर कुप्रभावों के चलते लोगों में प्राकृतिक रंगों (इको-फ्रेंडली रंगों) का चलन बढ़ा है। आलम यह है कि अब इन रंगों का प्रयोग इको-फ्रेंडली होली के नाम से विख्यात हो चला है।
वसंत के आगमन के उत्साह से परिपूर्ण स्वागत को भी होली कहा जाता है। पूर्व में वसंत ऋतु में खिलने वाले फूलों से होली हेतु प्राकृतिक विधियों से रंग बनाए जाते थे। मसलन टेसू के फूल व परिजात के फूलों से चटक लाल रंग बनाया जाता था। रंग बनाने में उन पेड़-पौधों के फूलों का ही उपयोग किया जाता था जिनके गुणधर्म औषधीय रहे हों। इस लिए प्राकृतिक ढंग से तैयार किए जाने वाले रंग त्वचा की रंगत के लिए लाभदायक भी होते हैं । इन सबके बावजूद धीरे-धीरे प्राकृतिक ढंग से तैयार रंगों का स्थान रसायन युक्त रंगों ने ले लिया, जो होली को रंगीन तो बनाते हैं परन्तु कभी-कभी इनकी बड़ी कीमत भी चुकानी पड़ जाती है। इतना ही नहीं बाजार में उपलब्ध अन्य रसायन कलर पेस्ट, ड्राई एवं वॉटर कलर भी रंग में भंग डाल जाते हैं।
इन बातों को जनसामान्य के सामने तथ्यों के साथ करीब सात साल पहले दिल्ली स्थित दो पर्यावरण समूहों ने रखा था । पर्यावरण संतुलन व संरक्षण हेतु समíपत इन समूहों ने गहन अध्ययन के बाद पेश की अपनी रिपोर्ट में दावे के साथ कहा कि होली खेलने हेतु बाजार में उपलब्ध रंग स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हैं क्योंकि बड़े पैमाने पर विभिन्न रसायनों का प्रयोग कर इनको तैयार किया जाता है। मसलन लाल रंग कॉपर सल्फेट की मदद से कैमिकल प्रोसेस्ड करके तैयार किया जाता है। ऐसा रंग आंख में पड़ने की दशा में अस्थाई अंधत्व की समस्या पैदा कर सकता है।
गुलाल में रसायनों की गंदगी:
अबीर - गुलाल के बिना तो होली की रंगत पूरी नहीं होती परन्तु उक्त समूहों ने कुप्रभावों को रेखांकित करते हुए कहा कि कलरंट एवं बेज नामक दो तत्वों का प्रयोग कर कैमिकल प्रोसेस्ड प्रक्रिया के जरिए गुलाल तैयार किया जाता है। कलरंट अस्थमा व त्वचा संबंधी रोगों का जनक माना जाता है। इससे आंखों को भी नुकसान होता है। वहीं बेज अर्थात एस्बेस्ट्स या सिलिका । यह तत्व मानसिक व शारीरिक दोनों प्रकार के स्वास्थ्य के लिए घातक होता है। खैर, होली के जोश में कुछ लोग औद्योगिक उपयोग हेतु बनाए गए रंगों को प्रयोग भी होली खेलने में कर बैठते हैं । पक्के रंग त्वचा को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाते हैं।
..आ अब लौट चलें :
उपरोक्त सभी समस्याओं के चंगुल में फंसने से बचने का सबसे प्रभावी तरीका एक ही है प्राकृतिक ढंग से तैयार रंगों का प्रयोग एवं ड्राई होली। इसके दो लाभ हैं एक तो पेयजल की बचत होती है दूसरा होली के रंग में भंग पड़ने की संभावना नहीं रह जाएगी। पर्यावरण प्रेमियों द्वारा इस बारे में पिछले दशक से चलाई जा रही मुहिम अब असर दिखाने लगी है और लोग ‘इको-फ्रेंडली होली’ नाम से होली मनाने लगे हैं।
इसमें प्राकृतिक ढंग से तैयार रंगों का इस्तेमाल किया जाता है। साथ ही ये लोग होली के नाम पर पेयजल को बरबाद करने से यथाशक्ति परहेज करते हैं। मतलब रासायनिक रंगों को बाय-बाय कर दिया है। खास बात यह है कि ‘इको-फ्रेंडली होली’ प्रेमी लोग विभिन्न जनसमस्याओं के प्रति लोगों में जागृति सुनिश्चित करने के लिए होली के लिए तरह-तरह के नारे बना कर संदेश देने के प्रयास करते हैं।
घर पर ऐसे तैयार करें प्राकृतिक रंग:
बहरहाल अब देश भर में प्राकृतिक रंगों का प्रचार करने वाली संस्थाएं ऐसे रंग तैयार करके बेचती भी हैं। इसके बावजूद होली में सामान्यत: प्रयुक्त होने वाले रंग आप घरेलू सामग्री का प्रयोग कर घर पर भी तैयार कर सकते हैं।