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राष्ट्रीय व सामाजिक पर्व बनाएं हम

होली विशेष. holika रंगों का पर्व, खुशियों को त्योहार और सिद्धि का समय होली है। होली का आगमन सभी के प्राणों को झंकृत कर देता है। सभी के दिलों में उमंग, उल्लास, जोश भर देता है, सभी उमंगित हो, उल्लासित हो नाचने-झूमने लगते हैं।

होली के आगमन के पूर्व ही जन-जीवन में बसंत अपनी मादकता का प्रभाव दिखाने लगता है, सबके दिलों में उमंग की लहर-सी दौड़ने लगती है, सभी में उत्साह, प्रेम का संचार होने लगता है। जन सामान्य के लिए होली भाईचारे का पर्व है वहीं यह साधु-साधकों के लिए सिद्धि का पर्व है। इस समय हम प्रकृति की आत्मा से फूटते रस भरे गीतों को सुनते हैं। लोक-संस्कृति तथा गीतों की मधुमय सुगंध से समस्त प्रकृति मदमस्त हो जाती है।

होली एक राष्ट्रीय व सामाजिक पर्व है। इस पर्व को नवसंवत्सर का आरंभ तथा वसंतागम के उपलक्ष में किया जाने वाला यज्ञ भी माना जाता है। प्रमुख तौर पर यह त्यौहार प्रह्लाद से संबंधित है। प्रह्लाद हिरण्यकश्यप का पुत्र और परम विष्णुभक्त था।

हिरण्यकश्यप विष्णुभक्ति से मना करता था किंतु प्रह्लाद भक्ति से नहीं डिगा। राक्षसराज ने प्रह्लाद को मारने के लिए अनेक उपाय किए, किंतु किसी में सफल नहीं हो सका। हिरण्यकश्यप की बहन होलिका को वरदान था अग्नि में न जलने का।

हिरण्यकश्यप ने इसका लाभ उठाना चाहा। उसने लकड़ियों के ढेर पर होलिका की गोद में प्रह्लाद को बैठाकर आग लगवा दी। प्रभुकृपा से प्रह्लाद बच गए और होलिका जल गई। अत: इसी के उपलक्ष्य में प्रतिवर्ष होली मनाई जाती है।

होली पर्व असुर वृत्ति का नाश करने का पर्व है। इसे खुशी, उमंग, उल्लास से मनाना चाहिए। होली का पर्व आता ही इसलिए है कि हम अपने को समाज से जोड़ें, उसमें घुलमिल जाएं अन्यथा आजकल व्यक्ति के पास इतना समय नहीं होता है कि वह बिना किसी काम के समाज में घुलमिल सके।





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