होली विशेष.
अभी नववर्ष के नएपन का अहसास फीका भी नहीं पड़ा था कि होली आ गई। यह मौसम ही कुछ ऐसा होता है कि मन में एक अजीब सी उमंग होती है। त्रस्त करके गए जाड़े की औपचारिक विदाई करती है होली। साथ ही यह अहसास भी दिलाती है कि आने वाला मौसम भी कम त्रस्त नहीं करेगा। फिर भी वसंत ऋतु में होली का आगमन सुखद अनुभूति की तरह होता है।
प्रकृति अपना पुराना चोला उतारकर नया चमकदार आवरण धारण करने की प्रक्रिया में होती है, तो अंग्रेजी नववर्ष के बाद नया हिंदी संवत्सर वर्ष भी उत्साह जगा रहा होता है। संभवत: तभी वसंत के मौसम में मन के भीतर कहीं कुछ शांति का अहसास रहता है। छोटी-बड़ी गलती को नजरअंदाज करने का भाव रहता है।
शायद इसीलिए होली के साथ अपने आप ही जुड़ गया है ‘बुरा न मानो होली है।’ इस समय मन कहीं अधिक ग्राही, प्रेमपूर्ण, क्षमाशील और स्वीकार्यता के भाव से ओतप्रोत रहता है। सभी गिले-शिकवे मिटाकर एक नई शुरुआत की प्रेरणा देता है यह मौसम और उसका खास त्योहार होली।
समय के साथ-साथ होली के अंदाज में भी खासा बदलाव आ चुका है। पहले की तरह अब रासायनिक होली के दिन लदते से प्रतीत हो रहे हैं। न छूटने वाले पेंट, हानिकारक रंगों की बजाय लोग सूखी या इको फ्रैंडली होली को तरजीह देने लगे हैं। यह बात मन को सुकून भी देती है। कम से कम अब वे लोग भी इस रंगीन त्योहार का मजा ले सकते हैं, जो कल तक गीली होली के नाम पर ही खुद को कमरे में बंद कर लिया करते थे।
सबसे बड़ा बदलाव यह देखने में आ रहा है कि होली अब सभी धर्मो का त्योहार बनकर उभरा है। रंगों की फुहार का अब वे लोग भी बुरा नहीं मानते, जो परंपरागत रूप से इसे नहीं खेलते। इन तमाम खूबियों को देखते हुए अब क्यों न होली को सर्वधर्म समभाव के तौर पर मनाया करें।
होलिका दहन के साथ रंगों के इस त्योहार की औपचारिक शुरुआत हो चुकी है। देश के कई भागों में तो होली कई दिन तक चलने वाला आयोजन होता है। तरह-तरह के गीले-सूखे रंगों से सराबोर लोग एक-दूसरे से गले मिलकर होली की शुभकामनाएं देते हैं और सभी पुराने गिले-शिकवे मिटाकर एक नई जिंदगी शुरू करते हैं।
कुछ राज्यों में होली रासलीला के माध्यम से मनाई जाती है। कृष्ण और राधा समेत गोपियों की रासलीला इस त्योहार में अपना अलग आकर्षण रखती है। इस दौरान गाए जाने वाले फाग मस्ती को एक नए चरम पर ले जाने का काम करते हैं।
गौर करने वाली बात यह है कि अब अन्य भारतीय त्योहारों की तरह होली भी अंतरराष्ट्रीय पर्यटकों को आकर्षित करने के क्रम में एक बड़ा और जबरदस्त आकर्षण साबित हो रही है। पिछले कुछ वर्षो से खासतौर पर होली पर आने वाले विदेशी पर्यटकों की संख्या में खासा इजाफा हुआ है। हजारों की संख्या में पश्चिमी देशों के पर्यटक होली के पर्याय बन चुके स्थानों पर पहुंचते हैं और खुद रंग में सराबोर हो इस विशिष्ट त्योहार का आनंद लेते हैं।
सर्वाधिक पर्यटक ब्रज की होली देखने पहुंचते हैं, जिसकी गोकुल और बरसाना की होली समय के साथ-साथ चहुंओर लोकप्रिय हो चुकी है। यहां की लट्ठमार होली तो भारत ही नहीं, दुनिया भर में खास आकर्षण रखती है। यही वजह है कि पर्यटक यहां टूट से पड़ते हैं। वे न सिर्फ यहां भक्तिरस में भाव-विभोर होकर रंग खेलते हैं, बल्कि भांग का सेवन कर उस दिव्यता की अनुभूति भी करते हैं, जिसके नाम पर रासलीला खेली जाती है।
राजस्थान की होली भी विदेशी पर्यटकों के लिए खास हो चुकी है। विशालकाय होलिका और उसके इर्दगिर्द परंपरागत रंग-बिरंगी वेशभूषा में नृत्य करते लोग पर्यटकों का मन मोह रहे हैं। इस अवसर पर गीत-संगीत की जमने वाली महफिल भी उन विदेशी मेहमानों के लिए किसी कल्पनालोक से कम का नजारा पेश नहीं करती है।
वैसे होली के इस प्रचार-प्रसार के लिए मीडिया को भी साधुवाद दिया जा सकता है। उसने रंगों के इस त्योहार को एक वैश्विक पहचान प्रदान की है। अगर गौर करें तो विभिन्न चैनलों पर होली का त्योहार हफ्ते भर पूर्व ही शुरू हो चुका है।
नतीजतन लोग मीडिया के प्रभाववश भी होली को हर बार एक नए अंदाज से मनाने की पुरजोर कोशिश करते हैं। एक समय राजकपूर की होली हिंदी फिल्मोद्योग में शीर्ष पर मानी जाती थी। उसके बाद अमिताभ बच्चन का दौर आया, तो इस बार शाहरुख खान और शबाना आजमी होली का सबसे बड़ा आयोजन करने जा रहे हैं।
अब जब भारत आर्थिक महाशक्ति बनने की राह पर अग्रसर है, तब भारतीय संस्कृति और उससे जुड़े त्योहार दुनिया भर में न सिर्फ लोकप्रिय हो रहे हैं, बल्कि तेजी से वहां अपना स्थान भी बना रहे हैं, ऐसे में होली अगर विदेशी पर्यटकों को आकर्षित करने का प्रभावी जरिया साबित हो रही है, तो इसमें अचंभित करने लायक क्या है! असली वैश्वीकरण तो यही है, जब हमारे त्योहार को मनाने के लिए पूरी की पूरी दुनिया ही साथ आ जाए।
लेखिका फैमिना की पूर्व संपादक हैं।