होली विशेष.
जिधर भी नजर जाती है सिवाय राम राज्य के कुछ और नहीं दिखता। सड़क पर राम राज्य। मकान के अंदर राम राज्य अर्थात अवध। मकान की ईंटों में अवध। सड़क के तारकोल और कंकरीट में अवध। दफ्तर में भी अवध ही अवध। थाने में अवध। कचहरी में अवध। राजधानी में अवध। खुद अवध में भी अवध ही अवध। खचाखच अवध भरा हुआ है और रघुवीर मस्ती से सब जगह होली खेल रहे हैं।
रघुवीर का अवध है सब कुछ रघुवीर का ही है। मजाल है कोई और अवध की तरफ आंख भी उठाकर देख सके। अवध की रियाया जिसे हिंदी में जनता और इंग्लिश में पब्लिक तथा भीड़ में अवाम कहा जाता है उसने भी दिल से, दिमाग से, वचन से और तन से स्वीकार कर लिया है कि अवध रघुवीर का ही है। रघुवीर को डिस्टर्ब करना बहुत महंगा पड़ सकता है।
होली खेलना रघुवीर का पुश्तैनी धंधा है जो कालांतर में रघुवीर एंड एसोसिट्स के लिए पेटेंट हो गया है। जब तक रघुवीर अवध में है या जब तक अवध रघुवीर के पास है कोई और होली खेलने की जुर्रत नहीं कर सकता। रंग की पुड़िया भी वही उठाएगा जिसे रघुवीर से एनओसी प्राप्त हो सकेगी या फिर वो रघुवीर के वंश का हो।
रघुवीर को पूरे अवध में होली खेलने की छूट है। अवध का कण-कण रघुवीर का है। रघुवीर जब चाहे जैसा रूप धारण कर सकते हैं। लीलाधर हैं। मायाधर हैं। ये जहां जैसे चाहे पिचकारी चला सकते हैं। किसी को भी उठाकर हौज में डाल सकते हैं। घी से होली खेल सकते हैं। सिर कढ़ाही में डुबा सकते हैं। पांचों उंगलियों पर घी मल सकते हैं। किसी के मुंह पर घी मल सकते हैं।
रघुवीर विद्यालय में होली खेलने घुसते हैं। विद्यार्थी परीक्षा दे रहे हैं। कुछ विद्यार्थी शिक्षा की छाती पर चढ़े बैठे थे। किताब से देखकर लिख रहे थे। रघुवीर ने एक हर्ष भरी दृष्टि अपने उन चेलों पर डाली जो शिक्षा की छाती पर चढ़े बैठे थे। उनके हाथ से पुस्तकें अवध का शिकार हो चुकी थीं। अवध में सबको छूट रहती है, चाहे वो कक्ष में आए या न आए।
अवध में रघुवीर ने यह भी सुविधा दिला रखी है कि उनके ऐसोसिएट्स पुस्तकों की बजाए चाकू और कट्टे भी रख सकते हैं। क्लासरूम को झींगुर और तिलचट्टों के लिए खाली कर दिया गया है। अवध में कलम और कट्टे को समान सम्मान दिया गया है। यह अवध ही है जहां त्यागी शिक्षार्थी और तिल-तिल चाटते चट्टों को बराबर जगह दी गई है।
रघुवीर के एसोसिएट्स ने बताया कि यहां के कुछ सिरफिरे और पागल शिक्षक हमें नकल की होली नहीं खेलने दे रहे हैं। हमारा त्योहार क्या व्यवहार तक चौपट करना चाहते हैं। हमारा कैरियर दांव में और भविष्य दांव की छांव में पहुंच रहा है। रघुवीर ने अपनी पिचकारी से रंगबाजी की। धार की तेजी से वो सारे गंवार शिक्षक जो अवध नहीं देख पा रहे थे दूसरे विद्यालय में जा गिरे। होली का रंग और तेज हो गया। एसोसिएट्स ने गाना लगा दिया। अवध में होली खेले रघुवीरा।
पूरी खाकी वर्दी पहने रघुवीर थाने में अपनी कुर्सी पर बैठे थे। थाने के सारे कर्मचारियों के हाथ में छोटी बड़ी पिचकारियां थीं जिनसे वे अपने-अपने स्तर पर थाना आगंतुकों से रंग इकट्ठा कर रहे थे। थाने में भी अवध दिख पड़ रहा था। चूंकि रघुवीर वर्दी में हैं इसलिए इनकी नजर में निरपराध और अपराधी के बीच कोई भेदभाव नहीं है। इनकी नजर में दोनों समान हैं। चूंकि रघुवीर होली खेल रहे हैं। इसलिए दोनों को गले लगा रहे हैं। दोनों से रंग लगा रहे हैं। दोनों से गुझिया पापड़ खा रहे हैं। गुनहगार से गुझिया तो बेगुनाह से पापड़। बाहर लाउडस्पीकर चीख रहा था अवध में होली खेले रघुवीरा।
रघुवीर ने सफेद कोट पहना पिचकारी उठाई और अस्पताल में घुस गए। कॉरीडोर में विचरण कर रही नर्स को अपने केबिन में बुलाकर अपने रंग में रंगा फिर वार्ड की ओर निकल गए। मरीजों के लिए बाहर से मंगवाई गई सारी दवा अपने पास मंगवाई और उसे बाहर के मेडिकल स्टोर पर वापस भिजवा दिया।
एक तरफ से सारे मरीजों को सारे टेस्ट लिख दिए और यह भी ताकीद कर दी कि ये जांचें सिर्फ फलां पैथालोजी सेंटर से ही कराई जानी चाहिए। रघुवीर के स्टेथस्कोप वाली बाहों के नाखून काफी बड़े-बड़े हो चुके हैं। उनमें लाल रंग फंसा हुआ है। होली अच्छी चल रही है। अल्ट्रासाउंड मशीन से सिर्फ एक ही साउंड निकल रही है। अवध में होली खेले रघुवीरा।
रघुवीर ने अपनी आंख पर काली पट्टी बांधी। तराजू उठाया एक तरफ वादी को रखा दूसरी तरफ प्रतिवादी को। वादी प्रतिवादी के वकीलों ने रघुवीर को रंग के पैकेट भेंट किए। दोनों तरफ से रंग बरसे। भीगे रघुवीर। थोड़ी देर बाद फैसले की घड़ी आ गई। रघुवीर को तय करना था कि रंग किसके पक्ष में खेलना चाहिए, किसके नहीं।
रघुवीर को चूंकि कुछ देखना ही नहीं होता है सिर्फ दिखाना होता है इसलिए रघुवीर ने दो पर्चियां बनवाई और उसमें से एक उठाकर पेशकार की ओर बढ़ा दी वही फैसला था। पेशकार ने पर्ची देखी। उसको पर्ची समझ में नहीं आई क्योंकि दूसरी पर्ची वाले ने पेशकार को भी काफी गुझिया पापड़ भेंट कर रखे थे इसलिए उसने अपने स्तर से रंग की पुड़िया बदल दी। रंग की बौछारों के बीच न्याय फैसले के रूप में आ गया। काली पट्टी काला रंग बनकर पूरे चेहरे पर फैल गई लेकिन दूर से आवाज आ रही थी अवध में होली खेले रघुवीरा।
रघुवीर के समर्थकों ने रघुवीर जिंदाबाद के नारे बुलंद किए। रघुवीर ने अवध की निरीह जनता के सामने हाथ जोड़े। मुस्कराए। अवध की जनता इतने से ही खुश हो गई कि रघुवीर ने उनके सामने हाथ जोड़े।
रघुवीर ने अपने विभिन्न रूपों को तलब कर रखा था। विद्यालय से, सड़क से, थाने से, अस्पताल से, अदालत से अपने नाना प्रकार के रूपों को देखकर रघुवीर ने जोरदार कहकहा लगाया। रघुवीर के सारे रूपों ने रंग के पैकेट के ढेर के ढेर इनके सामने रखने लगे। रघुवीर ने अपना काला रंग और सारे रंगों में मिलाया और आश्वस्त हो गए कि जब तक हमारे ये रूप जिंदा हैं तब तक अवध में सिर्फ और सिर्फ रघुवीर ही होली खेलेंगे।
तो इस होली पर भी गाना बजाइए-होली खेले रघुवीरा!