सम्पादकीय. भारत यात्रा पर आई अमेरिकी की प्रतिनिधि सभा की स्पीकर नैन्सी पेलोसी के तिब्बत प्रकरण में दिए गए बयान पर चीन की कड़ी प्रतिक्रिया से इस पर फिर से टकराव की स्थिति पैदा होने के आसार हैं। पिछले कुछ हफ्तों से तिब्बत में चीन विरोधी प्रदर्शनों के चलते जो हिंसा हुई उस पर भारत की संयत प्रतिक्रिया का चीन ने तो स्वागत किया था, पर नए घटनाक्रम में चीन द्वारा अमेरिका को उसके आंतरिक मामलों में दखल न देने की सलाह अप्रत्यक्ष रूप से भारत के लिए भी सावधान रहने का संदेश है।
नैन्सी पेलोसी को उनके आक्रामक चीन विरोधी रवैये के लिए जाना जाता है, और अपनी भारत यात्रा के दौरान शुक्रवार को धर्मशाला में उन्होंने तिब्बतियों के धर्मगुरु दलाई लामा से मुलाकात की और फिर एक सार्वजनिक आयोजन में उन्होंने खुल कर चीन की भत्र्सना की है।
अभी तक यह कहा जा रहा था कि तिब्बत की घटनाओं पर दुनिया के देशों ने, खासतौर पर पश्चिमी देशों ने, उस तरह से आलोचना नहीं की जैसी अफ्रीका या दुनिया के अन्य क्षेत्रों के मामलों में होती आई है। इसकी वजह, स्वाभाविक तौर पर, चीन का बढ़ता अंतरराष्ट्रीय महत्व और चीन का आर्थिक महाशक्ति के तौर पर उभरना कहा जाता है।
अमेरिका के राष्ट्रपति हालांकि तिब्बत मामले को लेकर आगामी बीजिंग ओलिंपिक खेलों के बहिष्कार की मांग को ठुकरा चुके हैं, पर नए घटनाक्रम के चलते स्थिति में कुछ परिवर्तन हो तो आश्चर्य नहीं। जहां एक ओर नैन्सी पेलोसी ने कहा कि तिब्बत के हालात दुनिया की अंतरात्मा के लिए एक चुनौती हैं जिससे सबको मिलकर निपटना चाहिए, वहीं दूसरी ओर अमेरिका की विदेश मंत्री कोंडोलिजा राइज ने भी चीन से तिब्बत मामले पर संयम की अपील की और सलाह दी कि वह दलाई लामा से बातचीत शुरू करें।
भारत के लिए तिब्बत न केवल शरणार्थियों के मानवाधिकारों जैसे संवेदनशील मामले से, बल्कि चीन के साथ सुधरते संबंधों से भी सीधे-सीधे जुड़ा है। ताजे बयान में भारत स्थित चीन के राजदूत ने एक बार फिर ‘दोस्त’ भारत द्वारा तिब्बत मामले पर रुख की सराहना की और उम्मीद जताई कि भारत यही रवैया भविष्य में भी बनाए रखेगा।
दलाई लामा के प्रति चीन के राजदूत ने काफी कड़े शब्दों का इस्तेमाल किया और कहा कि दुनिया को दलाई लामा के असली चेहरे और इरादों को जानना जरूरी है। इसके बाद चीन द्वारा दलाई लामा से वार्ता करने की संभावनाएं धूमिल हुई हैं, जबकि दलाई लामा स्वयं चीन से बात करने की इच्छा को दोहरा चुके हैं। अब भारत के सामने चुनौती यह है कि चीन, अमेरिका और तिब्बतियों की मांग के बीच समन्वय कैसे बनाए रखे।