इंदौर. इंदौर विकास प्राधिकरण की स्कीम-136 और 140 पर हाईकोर्ट के स्टे के बाद इनके 1100 प्लॉट लॉटरी प्रक्रिया से कम हो सकते हैं। हालांकि अध्यक्ष मधु वर्मा के मुताबिक जनता के लिए घोषित प्लॉट में से एक भी कम नहीं होगा। भूस्वामियों के लिए प्लॉट अलग निकाल रखे हैं।
इसके बाद भी गुरुवार को कोर्ट में नक्शे पर वह क्षेत्र नहीं दर्शा पाने और शुक्रवार को टाउन एंड कंट्री प्लानिंग तथा मीडिया के सामने पक्ष नहीं रख पाने के बाद प्राधिकरण की भूमिका संदिग्ध हो गई है। स्कीम-136 व 140 के साथ 134 मिलाकर लगभग 3,200 प्लॉट लॉटरी के जरिए बांटे जाना थे। अनुमान है अंतिम तिथि तक लगभग दो लाख लोग इनके लिए आवेदन करेंगे।
प्राधिकरण की इन स्कीमों का इंतजार लंबे समय से हो रहा था। आवेदनों की मारामारी को देख लगने लगा था हेराफेरी से बचने के लिए लोग प्राधिकरण पर विश्वास कर रहे हैं लेकिन इस मामले में उसकी संदिग्ध भूमिका ने वह भरोसा भी तोड़ दिया। उनका कहना है प्राधिकरण अधिकारियों की गैरजिम्मेदारी का हर्जाना हम क्यों भुगते? वे समय पर जवाब देते तो स्टे नहीं होता। जिनके कारण ऐसा हुआ उन पर भी कानूनी कार्रवाई होना चाहिए।
स्कीम-136: हाईकोर्ट और टीएनसीपी को अलग-अलग जानकारी
स्कीम-136 प्राधिकरण ने 6 नवंबर 1993 को लागू की थी जिसकी अनुमति सरकार से 1 नवंबर 2002 को मिली। 2003 में प्राधिकरण ने सीईओ के हवाले से डायरेक्टर टीएनसीपी को लिखा स्कीम-2002 से लागू की गई है। ऐसा मानने पर उसे 20 प्रतिशत प्लॉट जमीन मालिकों को देना जरूरी है। उधर, कोर्ट में उसने 1993 में स्कीम लागू होना बताया।
‘न लाभ, न हानि’, फिर भी 113.50 करोड़ का मुनाफा
प्राधिकरण ‘न लाभ, न हानि’ की दर पर निम्न मध्यमवर्ग व गरीबों को प्लॉट आवंटित करने का दावा करता है लेकिन स्कीम-136 की जमीन 700 रुपए वर्गफीट पर देने के बाद भी 113.50 करोड़ का लाभ होगा।