मुंबई. सरकार महंगाई को काबू करने के तमाम प्रयास करे तब भी मुद्रास्फीति को 6 फीसदी से नीचे रखना मुश्किल होगा। खासतौर से खाद्य पदार्थो की कीमतें बढ़ती रहेंगी। कारण: आपूर्ति कमजोर है और अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें बढ़ रही हैं।
एचडीएफसी बैंक के मुख्य अर्थशास्त्री अभीक बरुआ की राय में मुद्रास्फीति जून से अगस्त के बीच 6 फीसदी के आसपास रहेगी। सरकार के आयात शुल्क में कटौती करने के बाद भी मुद्रास्फीति नीचे नहीं आएगी। बरुआ का कहना है कि जून के बाद हमें 6 फीसदी मुद्रास्फीति के लिए तैयार हो जाना चाहिए। सरकार खाद्य तेल पर आयात शुल्क घटा रही है और चावल जैसी वस्तुओं के निर्यात पर रोक लगा रही है। लेकिन अंतरराष्ट्रीय कारणों से कीमतों में तेजी है और मुद्रास्फीति को नीचे लाना मुश्किल है।
बरुआ की नजर में रिजर्व बैंक को सतर्क रहना होगा और ब्याज दर बढ़ाना इस समय उचित नहीं होगा, क्योंकि फिलहाल मुद्रास्फीति बढ़ने का कारण आपूर्ति का अभाव है। पिछले सप्ताह मुद्रास्फीति रिजर्व बैंक के 5-5.5 फीसदी का निशान पार कर चुकी है। लीमैन ब्रदर्स की अर्थशास्त्री सोनल वर्मा का कहना है कि बेसिक मेटल की कीमतों में तेज वृद्धि हुई है।
वर्मा के मुताबिक, ‘जिस तरह से उपभोक्ता वस्तुओं की कीमतें बढ़ रही हैं, मुद्रास्फीति बढ़ेगी। मुद्रास्फीति का आंकड़ा 5 फीसदी से ऊपर रहेगा और रिजर्व बैंक के सामने दुविधा बनी रहेगी।’ बेसिक मेटल, मिश्र धातुओं व धातु उत्पादों का समूह 6.7 फीसदी बढ़ा है।
एमसीएक्स के अर्थशास्त्री वी षण्मुगम का ख्याल है कि अमेरिका में मंदी के बाद उपभोक्ता वस्तुओं की कीमतों में भारत को कुछ राहत मिल सकती है।
खाद्य पदार्थो की महंगाई लाइलाज-
- देश की प्रमुख मंडियों में सब्जियों और फलों के दाम दोगुने तक हो चुके हैं। दिल्ली एग्रीकल्चरल एंड मार्केटिंग बोर्ड का आकलन है कि 48 फलों व सब्जियों की कीमतें दोगुनी हो गई हैं।
- आलू की जबर्दस्त फसल भारत में ही नहीं बांग्लादेश में भी है। आलू, टमाटर और चीनी उपभोक्ता को राहत देने वाले रहेंगे।
- दूध, डेरी उत्पाद, दालों, अनाज और खाद्य तेल की कीमतें तेजी से बढ़ी हैं। क्रिसिल के अर्थशास्त्री डीके जोशी का कहना है कि सरकारी उपायों के बाद भी कीमतों पर दबाव रहेगा।
- दुनिया में खाद्य पदार्थो का स्टाक 20 साल में सबसे कम होगा। इसलिए उपभोक्ताओं को ज्यादा कीमतें चुकानी होंगी।
- अंतरराष्ट्रीय बाजार में महंगे खाद्य पदार्थो के कारण आयात भी महंगा रहेगा। घरेलू कीमतें कम करना मुश्किल होगा।