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लिखिए और भुलाइए कैंसर का दर्द

न्यूयॉर्क. अगर आपका कोई प्रिय कैंसर से जूझ रहा है तो उसे सलाह दीजिए कि वह कलम उठाए और लिख डाले जो उसके मन में है। जी हां अपनी भावनाओं को कागज पर उतारने पर उसे काफी आराम मिलेगा।

'द आंकोलाजिस्ट' जर्नल में प्रकाशित रिपोर्ट में बताया गया है कि अपने भय को लेखन के जरिए व्यक्त करने वाले कैंसर के मरीज बीमारी के बारे में अपने सोच में सकारात्मक बदलाव महसूस कर सकते हैं।

लोंबार्डी कांप्रिहेंसिव कैंसर सेंटर की प्रमुख शोधकर्ता नैंसी मोरगन के शब्दों में- पूर्ववर्ती शोधों के मुताबिक अभिव्यक्ति परक लेखन शारीरिक और मानसिक सशक्तता को बढ़ावा देता है। इनमें अधिकतर अध्ययन तीन से लेकर पांच लेखन सत्रों के नतीजों पर आधारित हैं। लेकिन मौजूदा अध्ययन के नतीजे बताते हैं कि बार-बार व्यवधान के बावजूद भावना की अभिव्यक्ति से संबंधित एक लेखन सत्र भी कैंसर के मरीजों पर सकारात्मक असर डाल सकता है।

नैंसी और उनकी टीम वाशिंगटन के एक कैंसर क्लीनिक में 70 मरीजों पर किए गए अध्ययन के बाद इस नतीजे पर पहुंची है। यह अध्ययन वर्ष 2006 में जुलाई से नवंबर के दौरान किया गया था। इसमें लेखन पूर्व सर्वे और लेखन के बाद के सर्वे का विश्लेषण शामिल है। इसके तहत 20 मिनट का अभिव्यक्ति परक लेखन और तीन हफ्ते बाद टेलीफोन के जरिए सर्वे को अध्ययन का माध्यम बनाया गया।

अध्ययन के सभी भागीदारों ने लेखन पूर्व सर्वे में हिस्सा लिया। जबकि 20 मिनट के लेखन में 88 फीसदी ही शामिल हुए। लेखन बाद के सर्वे से ये संकेत मिले हैं कि 20 मिनट के अभिव्यक्ति परक लेखन के अभ्यास को अंजाम देने वाले 49 फीसदी मरीजों में अपनी बीमारी के प्रति सोच में बदलाव आया।





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