लीडरशिप मंत्र.भावनात्मक रूप से जुड़ाव के बाद हम सही वस्तुस्थिति को समझने में अक्सर नाकाम रहते हैं।
कुछ वर्ष पहले मैं बेंगलूर में अपने लिए एक घर की तलाश में था। डबल बेड रूम और उसके पीछे एक पूल वाला घर मुझे पसंद भी आ गया। वह लगभग दस वर्ष पुराना था, फिर भी उसका आकर्षण जबरदस्त था।
मैं उसे लेने का निर्णय तक कर चुका था। हालांकि मेरे कुछ शुभचिंतक मुझे उसे लेने से मना कर रहे थे। चूंकि मैं उस घर से भावनात्मक रूप से जुड़ गया था और सिर्फ सकारात्मक बातें ही देख रहा था, इसलिए मैं उन्हें संतुष्ट करने के सारे तर्क दे रहा था। यहां तक कि मैंने वे सारी औपचारिकताएं भी पूरी करनी शुरू कर दीं, जो घर को खरीदने के लिए जरूरी थीं। लेकिन इसी बीच जब मेरी घर खरीदने की उत्कंठा कुछ शांत हुई, तो मुझे उस घर से जुड़ी समस्याएं नजर आनी शुरू हुईं। यहां तक कि मुझे लगने लगा कि यह शायद अक्लमंदी का सौदा नहीं होगा।
अंतत: मैंने उस घर को लेने का इरादा त्याग दिया। साथ ही उस घटना से कुछ सबक भी सीखे। आप भी जब किसी चीज से भावनात्मक स्तर पर जुड़ जाएं, तो निम्नलिखित बातों का ध्यान रखें-
1. हम वस्तुस्थिति का सही आकलन और निर्णय करने की स्थिति में नहीं रहते हैं।
2. हम अपने पक्ष को सही ठहराने की हरसंभव कोशिश करते हैं।
3. हम अपने शुभचिंतकों, सहयोगियों और मित्रों की सही और अच्छी सलाह को भी नजरअंदाज करने लगते हैं।
4. चूंकि हमारी सोच में स्थायित्व नहीं होता, अत: हम दूसरों की भावनाओं को आहत करने लगते हैं।
सबक यह है कि एक लीडर के लिए बहुत जरूरी है कि वह अपने निर्णय से भावनात्मक रूप से न जुड़ा हो। भावनात्मक रूप से जुड़ाव के बाद हम अपने निर्णय के पक्ष में तर्क जुटाने लगते हैं और सही वस्तुस्थिति को समझने में नाकाम रहते हैं।
-लेखक नेतृत्व प्रशिक्षण संस्था लीडकैप के संस्थापक हैं।