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अपने हाथों विरासत नष्ट करते हम

दृष्टिकोण.तथाकथित विकास के नाम पर हम जिस तेजी से जंगलों को नष्ट कर बस्तियां बसा रहे हैं, वास्तव में उसके साथ ही अपने आपको नष्ट करने की दिशा में भी आगे बढ़ रहे हैं।

देश के वन अधिकारियों के लगभग एक दशक के सतत इनकार के बावजूद यह सच आखिर सामने आ ही गया कि बाघों की संख्या बड़ी तेजी से घटती जा रही है। नेशनल टाइगर अथॉरिटी के मुताबिक पांच साल पूर्व जितने बाघ थे, उनमें से आधे बाघों को आज हम खो चुके हैं। वैसे देखा जाए तो पांच साल पहले भी बाघों की संख्या उतनी नहीं थी, जितनी प्रोजेक्ट टाइगर ने दावा किया था। इस पैमाने पर तो आज बाघों की संख्या बहुत ही निराशाजनक है। प्राकृतिक रहवास के खात्मे और अंतरराष्ट्रीय वन्य जीव व्यापार के फिर से शुरू हो जाने के कारण आज बाघ विलुप्त होने की कगार पर पहुंच गए हैं।

यह एक ऐसी कड़वी सचाई है, जिसे हमारे प्रधानमंत्री को स्वीकारना ही होगा। १९७३ में जब प्रोजेक्ट टाइगर की शुरुआत की गई थी, उस समय देश में बाघों की संख्या लगभग २क्क्क् थी, जबकि आज देश में जीवित बाघों की संख्या लगभग १४क्क् के आसपास बताई जा रही है। सच कहूं तो यह आंकड़ा भी बढ़ा-चढ़ाकर ही बताया जा रहा है।भारतीय वन्यजीव संस्थान द्वारा इस संबंध में की गई अथक कवायद को भी एक साल से ऊपर हो चुका है, तब से कोई ऐसा दिन नहीं गया होगा, जब बाघों के मरने के समाचार सुर्खियों में न रहे हों। कभी गांव वालों ने जहर दे दिया, तो कभी शिकारियों ने बाघ को मार डाला। कभी तेज रफ्तार गाड़ियों ने कुचल दिया, तो कभी उनकी खाल और हड्डियों की जब्ती जैसी घटनाओं की रिपोर्ट्स आती रहीं।

ऐसे में अगर यह फिर पूछा जाए कि आज देश में बाघों की संख्या कितनी है, तो मेरा जवाब है १क्क्क् से भी कम। यह संख्या भी दिनोंदिन घटती जा रही है क्योंकि आज भी अवैध रूप से इनका शिकार जारी है। सच पूछें तो भारत में बाघ क्यों नहीं मरने चाहिए और इनकी रखवाली करे भी तो कौन? खासकर जब हमारे प्रधानमंत्री स्वयं उनकी नियति के प्रति संवेदनहीन और उदासीन रवैया रखते हैं। उड़ीसा के मुख्यमंत्री को राज्य की खदानों और बंदरगाहों के परे कुछ नजर ही नहीं आता। आखिर पिछली बार आपने हमारे वित्त मंत्री, वाणिज्य मंत्री या कृषि मंत्री को मारे जा रहे बाघों पर चिंता प्रकट करते और उन्हें बचाने के बाबत सार्वजनिक वक्तव्य देते कब सुना था?

यह उनकी जिम्मेदारी से परे नहीं है, जैसा कि बहुत लोग मानते हैं। कृषि, वाणिज्य और जल आपूर्ति के सथ प्राकृतिक भारत का बने रहना हमारे वन्यजीवों, जंगलों और पारिस्थितिकी तंत्र को जीवित बनाए रखने की क्षमता पर निर्भर करता है। जो कोई भी जलवायु परिवर्तन के कारण और प्रभाव को समझता है, वह इस सचाई को भलीभांति जानता है। पिछले दिनों मुंबई के मरीन ड्राइव पर दस लाख से अधिक बच्चे एक सार्वजनिक रैली के दौरान बाघों को बचाने के लिए इकट्ठा हुए।

इसका आयोजन कर्नाटक के प्रसिद्ध हुली वेशा डांसरों ने किया था। यह संस्था पिछले तकरीबन एक दशक से बाघों को बचाने के लिए प्रयासरत है। भविष्य में देश के पारिस्थितिकी तंत्र पर आने वाले संकट के क्रम में वे देश के लोगों को गहरी तंद्रा से जगाने की कोशिश कर रहे हैं। हममें से प्रत्येक को इन बच्चों के सथ मिलकर काम करना चाहिए।

दुखद यह है कि केवल बाघ ही नहीं मर रहे हैं, भारत में आज बाघों की तुलना में तेंदुए कहीं अधिक मारे जा रहे हैं। तेंदुए के पहले जीवाश्म को तंजानिया के लेटोली नामक स्थान पर खोजा गया था, जो कि लगभग ३.८ मिलियन वर्ष पुराना था। ऐसा माना जाता है कि यूरेशिया में तेंदुआ लगभग ९ लाख वर्ष पहले पाया जाता था।

मानव आबादी के निकट गुपचुप तरीके से रहने के गुण के बलबूते तेंदुए ने अविश्वसनीय रूप से अपने आपको रेगिस्तान, सूखी झाड़ियों, घास के मैदानों और ऊंचे पर्वतों से लेकर घने जंगलों तक रहने के योग्य बना लिया है। तेंदुए के इन रहवासों में मुंबई का संजय गांधी नेशनल पार्क भी शामिल है, जिसके चारों तरफ कचरे के ऊंचे-ऊंचे ढेर उसके लिए मददगार साबित हो रहे हैं। जगह-जगह पसरे ये कूड़े के ढेर कुत्तों को आकर्षित करते हैं, जो तेंदुए के लिए आसान भोजन साबित होते हैं।

संजय गांधी पार्क के तेंदुओं ने कुत्तों के रूप में उपलब्ध खाद्य आपूर्ति का फायदा उठाना सीख लिया है। नतीजतन इनकी संख्या में तेजी से बढ़ोतरी हुई है। जब तेंदुए कुत्तों की खोज में जंगल से बाहर आते हैं, तो वे मनुष्यों के साथ संघर्ष में उलझ जाते हैं, जिसका परिणाम दोनों के लिए बुरा होता है। मुंबई की कुख्यात तेंदुआ समस्या का मूल कारण भी यही है।

इस समस्या के समाधान के लिए विशेषज्ञों की राय कुत्तों को मारने से लेकर तेंदुओं को मारने तक बदलती रहती है। कचरों के ढेर को हटाने जैसे पर्यावरणीय रूप से उचित विकल्प को अमल में लाने का कोई प्रयास नहीं किया जा रहा है, जिससे कि कुत्तों की संख्या में कमी आए। पार्क के भीतर कड़ी सुरक्षा के साथ-साथ जंगली शाकभक्षियों की संख्या को भी बढ़ाना चाहिए, इसी प्रकार से इस संतुलन को वापस पाया जा सकेगा।

अनुकूलन के लिहाज से तेंदुआ बिल्ली प्रजाति का एक मनोहारी जीव है। पेड़ पर चढ़ते तेंदुए की तुलना सिल्क के सरकते रूमाल से की जाती है। इसके बावजूद असम के काजीरंगा नेशनल पार्क में इसे निर्ममता से मार डाला जाता है। पुलिस अधिकारियों को जब इस तेंदुए का मृत शरीर सौंपा जाता है, तो वे तुरंत उसके पंजों से नाखून निकाल लेते हैं। वे नाखून जो उसे पेड़ों पर चढ़ते-उतरते खूबसूरत जानवर का खिताब दिलाते हैं।

प्रत्येक बाघ, तेंदुए, हाथी और बारहसिंघा के मरने के साथ ही थोड़ी-थोड़ी मात्रा में भारत की भी मृत्यु होती जाती है। क्या ऐसा ही भारत हम बनाना चाहते हैं? प्रकृति पूजा और उसके नियमों का पालन करने वाले सुसंस्कृत देश से क्या हम कसाई बन चुके हैं? क्या हम महात्मा गांधी, विनोबा भावे और भगवान महावीर के सबक भूल चुके हैं? क्या हम अपनी स्वतंत्रता रूपी नियामत को नष्ट करने जा रहे हैं, जिसे हमारे पूर्वजों ने बड़े बलिदानों के बाद हासिल किया था। ब्रिटिश शासन की तुलना में कहीं अधिक तेजी और लालच के साथ हम अपनी समृद्ध विरासत को जिस तरह नष्ट कर रहे हैं, उससे तो यही लगता है।





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