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जनसुविधाओं की जमीन का उपयोग बदल डाला

इंदौर. नगरीय प्रशासन एवं विकास विभाग के प्रमुख सचिव को भेजी गई बख्तावररामनगर की जांच रिपोर्ट में कई अनियमितताओं का खुलासा किया गया है। रिपोर्ट में स्पष्ट है कॉलोनाइजर ने सार्वजनिक-जनसुविधा के लिए संरक्षित जमीन का रकबा और उपयोग बदला है। वहीं बख्तावररामनगर गृह निर्माण संस्था के पदाधिकारी इन आरोपों को बेबुनियाद और अधिकारियों का चुनावी षड्यंत्र मानते हैं। उधर, इस बहस ने कॉलोनी के साढ़े चार सौ से ज्यादा परिवारों को चिंता में डाल दिया।

रिपोर्ट कलेक्टर विवेक अग्रवाल, संयुक्त संचालक टाउन एंड कंट्री प्लानिंग विजय सावलकर और निगम के सिटी इंजीनियर अशोक बैजल ने २९ फरवरी २क्क्८ को तैयार की। दस पेज की रिपोर्ट में मंजूर नक्शे और मैदानी हकीकत में काफी अंतर बताया गया। जांच अधिकारियों के अनुसार कागजों पर कॉलोनी का क्षेत्रफल १५.५८ एकड़ है जबकि वास्तव में १.९७ एकड़ ज्यादा है। अतिरिक्त जमीन का प्लान मंजूर नहीं है।

स्कूल, सर्वेट क्वाटर्स और गंदी बस्ती के लिए आरक्षित जमीन पर निजी इमारतें तनी हैं। प्रस्तावित ८क् फीट चौड़ी सड़कें राज्य सरकार से ४क् फीट की करवाई गईं और वास्तव में तीस फीट से ज्यादा नहीं है। बाकी हिस्से में मकान बने हैं। नागरिक सुविधाओं (एमिनिटिज) का क्षेत्रफल स्वीकृति से ११,८११.२५ वर्गफीट ज्यादा है। इसके लिए गार्डन का क्षेत्रफल कम करते हुए क्लब (अजीत एंड अजीत क्लब) और होटल (रॉयल कोर्ट) में शामिल कर लिया गया।

वर्तमान में एमिनिटिज के रकबे का पूरी तरह व्यावसायिक उपयोग किया जा रहा है। ३७३६.६९ वर्गमीटर में क्लब-होटल का नक्शा (भवन अनुज्ञा-८९क्)निगम इंजीनियर ज्ञानेंद्रसिंह जादौन और के.आर. व्यास ने १८ जून १९९६ में स्वीकृत किया था, जो विधायक प्रेमचंद गुड्डू के नाम से जारी हु़आ। उस पर उनके दस्तखत भी हैं।

मामले में निगमायुक्त नीरज मंडलोई और तहसीलदार नजूल से विधिवत कार्रवाई की बात भी कही गई है। रिपोर्ट में भवन अनुज्ञा देने वाले निगम के अफसरों के साथ टाउन एंड कंट्री प्लानिंग के उन अधिकारियों को भी दोषी माना गया जिन्होंने अनाधिकृत निर्माण पर कार्रवाई नहीं की। हालांकि ऐसी एक रिपोर्ट सात साल पहले भी कलेक्टर ने भेजी थी लेकिन कार्रवाई आज तक नहीं हुई।

अवैध है सेक्टर ‘एफ’

रिपोर्ट के मुताबिक कॉलोनी के नौ नक्शे पास हुए थे। इनमें तीसरे नंबर के नक्शे में खसरा-१४६, १४६/२, १६१ और १६७ पीपल्याहाना पर ग्रुप हाउसिंग की मंजूरी ११,६३२.६३ वर्गमीटर जमीन पर दी गई। इसे ‘एफ’ सेक्टर कहा जाता है लेकिन टाउन एंड कंट्री प्लानिंग और निगम के कॉलोनी सेल में इस सेक्टर का ले-आउट प्लान स्वीकृत नहीं।

नक्शे ही नहीं

नगर की स्वीकृति १५.५८ एकड़ में दी गई थी। इसके अलावा नौ प्रकरणों में मंजूर नक्शों (जो बख्तावररामनगर गृह निर्माण सहकारी संस्था के नाम से नहीं थे) के क्षेत्रफल का सर्वे किया तो कुल क्षेत्रफल 8४१,११२.३२ वर्गमीटर निकला। इसमें खसरा क्र. १५१/२, १६क्, १६क्/१ से १६क्/७ का क्षेत्रफल नहीं है क्योंकि निगम द्वारा भूमि के संबंध में की गई कार्रवाई संबंधी नक्शे उपलब्ध नहीं हैं।

श्मशान को भी नहीं बख्शा

सर्वे नं.१४६ आबादी और सर्वे नं.१४७ नजूल श्मशान की जमीन है। कॉलोनी विकास के दौरान इस जमीन पर भी अतिक्रमण किया गया। इस पर तहसीलदार नजूल को अतिक्रमण पर कार्रवाई के निर्देश दिए जा चुके हैं।

अनुमति और जांच : सिलसिला 23 साल का

15 फरवरी 1985- 15.58 एकड़ जमीन पर बख्तावररामनगर गृह निर्माण सहकारी संस्था की कॉलोनी का ले-आउट प्लान मंजूर हुआ।
28 जुलाई 1986 और मई 87 - टीएनसीपी ने समय सीमा दिसंबर 1988 तक बढ़ाई।
फरवरी 1992, अप्रैल 95, फरवरी 1996 और मई 1998- सशर्त अभिन्यास मंजूर।
फरवरी 2002- अंतिम बार ले-आउट में संशोधन।
1995-96- संयुक्त संचालक जी.वी.उपाध्याय ने आवासीय उपयोग की मंजूरी दी। राज्य सरकार के निर्देश पर सड़कों की चौड़ाई 80 से 40 फीट कर दी गई।
दिसंबर 1996- भवन अधिकारी श्रीराम शर्मा और श्याम शर्मा ने गुलाब चौधरी को भवन अनुज्ञा जारी की।
जुलाई 1997- 11632.63 वर्गमीटर के ‘एफ’ सेक्टर में ग्रुप हाउसिंग की अनुमति भवन अधिकारी हंसकुमार जैन, रमाकांत शुक्ला और श्याम शर्मा ने दी। बाद में भवन अधिकारी जी.एस.जादौन, रमाकांत शुक्ला, श्याम शर्मा, श्रीराम शर्मा, नरेंद्रसिंह तोमर के कई नक्शे पास किए।

कई बार हुई जांच

>> मोतीलाल वोरा के मुख्यमंत्री रहते नगरीय प्रशासन विभाग ने जांच की।
>> बाबूलाल गौर ने भी नगरीय प्रशासन मंत्री रहते जांच करवाई।
>> दिग्विजयसिंह की कांग्रेस सरकार ने 1990 से 93 के बीच दूसरी बार जांच करवाई।
>> 2000- नगरीय प्रशासन विभाग ने जांच के आदेश दिए।
>> 2001- कलेक्टर मनोज श्रीवास्तव ने जांच रिपोर्ट सौंपी।
(इसके अलावा निगम स्तर भी कई बार जांच हुई। कुछ प्रकरण न्यायालय में भी विचाराधीन हैं।)

इस बार की जांच

नगरीय प्रशासन एवं विकास के विभाग ने आदेश (11/18-2/2000) में बख्तावररामनगर की जांच के लिए कलेक्टर की अध्यक्षता में कमेटी गठित की जिसमें संयुक्त संचालक टीएनसीपी और सिटी इंजीनियर को सदस्य बनाया गया।

कलेक्टर के फर्जी हस्ताक्षर :

9 अप्रैल 2001 को नगरीय प्रशासन एवं विकास विभाग के सचिव को दी गई रिपोर्ट में कलेक्टर मनोज श्रीवास्तव भी कॉलोनी में हुई हेराफेरी का खुलासा कर चुके हैं। उन्होंने डायवर्शन प्रकरण एवं पटवारी अभिलेखों की जांच कर स्पष्ट किया कि इसमें कलेक्टर के हस्ताक्षर फर्जी है।





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