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4 हजार करोड़ के काम धरे रह गए

रायपुर. वित्तीय वर्ष 2007-08 को खत्म होने में कुछ दिन बचे हैं, लेकिन राज्य के बजट का बड़ा हिस्सा खर्च नहीं हो पाया है। विशेषज्ञों का अनुमान है कि दिल खोलकर खर्च किया गया, तब भी बजट की 75 फीसदी रकम ही निकल पाएगी। 15500 करोड़ रुपए का बजट तथा 2000 करोड़ रुपए का अनुपूरक बजट था।

इनमें खर्च नहीं होने वाली रकम का हिसाब-किताब लगाया जाए तो यह चार हजार करोड़ रुपए के आसपास हो जाएगी। लोक निर्माण विभाग, पीएचई और जल संसाधन जैसे वर्क्‍स डिपार्टमेंट में बजट की तकरीबन आधी राशि ही खर्च हो पाई है।

इन विभागों के अफसरों ने माना कि वित्तीय वर्ष के अंत तक कितना भी हाथ-पैर मार लें, पूरा बजट खर्च नहीं किया जा सकता। किसी विभाग में 80 प्रतिशत तक राशि खर्च होगी तो किसी में 70 से 75 प्रतिशत। कुल मिलाकर बजट की 75 प्रतिशत राशि ही खर्च होने का अनुमान है।

वर्क्‍स डिपार्टमेंट में हर साल की तरह इस साल भी सामान्य क्षेत्रों में राशि बराबर खर्च हो रही है लेकिन नक्सल प्रभावित जिलों के अंदरूनी क्षेत्रों में राशि खर्च नहीं हो पा रही है। नक्सली क्षेत्रों में सड़क, पानी, बिजली, स्कूल और स्वास्थ्य के क्षेत्र में काम करने के लिए बजट में प्रावधान तो कर दिया गया, लेकिन वहां काम नहीं हो रहे हैं।

विभागों के इस साल के परफारमेंस पर नजर डाली जाए तो मामला उत्साहवर्धक नहीं है। 31 जनवरी 08 तक लोक निर्माण विभाग ने 2205 करोड़ रुपए के बजट में से केवल 988 करोड़ 39 लाख रुपए खर्च किए। जलसंसाधन विभाग ने 995.96 करोड़ रुपए के बजट में से 497.83 करोड़ रुपए खर्च किए हैं। कृषि विभाग ने 336.63 करोड़ रुपए के बजट में से सिर्फ 141.27 करोड़ रुपए खर्च किए हैं।

वित्तीय वर्ष 2006-07 के आंकड़ों पर ही नजर डालें तो लोक निर्माण विभाग के 1344 करोड़ रुपए के बजट में 171 करोड़ 37 लाख रुपए खर्च नहीं हो पाए थे। जलसंसाधन विभाग के 930 करोड़ रुपए के बजट में 171 करोड़ रुपए धरे रह गए।

कृषि विभाग के 227 करोड़ के बजट में 38 करोड़ रुपए लैप्स हो गए थे। इस तरह तीन प्रमुख विभागों के 380 करोड़ रुपए लैप्स हो गए। बजट खर्च क्यों नहीं हो पाया, इस मामले में सभी विभागों की अपनी-अपनी दलील है।

एक अफसर ने इतना कहा कि हमारा काम राशि मांगना है। वित्त विभाग पैसे ही नहीं देगा तो हम क्या कर सकते हैं। बजट आबंटन और राशि मिलने के बीच की जो प्रक्रिया है, उसके कारण बजट की पूरी राशि खर्च नहीं हो पा रही है।

बचे पैसे से बन जाएगी राजधानी : बजट के चार हजार करोड़ रुपए लैप्स होने का राज्य के विकास पर असर पड़ना तय है। इतनी रकम से राज्य की सबसे महत्वपूर्ण परियोजना नई राजधानी को पूरा किया जा सकता है। शहरों की पानी और सड़क की अधूरी योजनाओं को पूरा किया जा सकता है। नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में विकास की गति को तेज करने में इतनी रकम से बड़ी मदद मिल सकती है।

सेंट्रल फंड पूरा नहीं मिल रहा : सीएम
मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह ने विधानसभा में कहा है कि विभागों को केंद्रीय मद से मिलने वाली राशि नहीं मिल रही है। इस कारण खर्च राशि का प्रतिशत बहुत कम नजर आता है। केंद्र सरकार से मिलने वाली पूरी राशि खर्च होने पर खर्च का प्रतिशत बढ़ा नजर आएगा। वैसे उन्होंने उम्मीद जताई है कि साल पूरा होने तक विभागों की पर्याप्त राशि खर्च हो जाएगी।

बहुत सी बाधाएं : मूणत
लोक निर्माण विभाग राज्यमंत्री राजेश मूणत का मानना है कि बजट का 80 प्रतिशत हिस्सा खर्च होना आदर्श स्थिति होती है। कई काम ऐसे होते हैं जिनमें अनेक बाधाएं आती हैं। किसी में टेंडर एक बार में फाइनल नहीं होता तो किसी में ठेकेदार नहीं आते। नक्सली क्षेत्रों में इस तरह की समस्या अधिक आती है। फिर भी फरवरी-मार्च में बजट की ज्यादातर राशि खर्च होती है।





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