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संस्कृत एक भाषा से अधिक हमारी संस्कृति की प्रतीक

आलेख. संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा वर्ष 2008 को विश्वभाषा वर्ष के रूप में घोषित किया गया है। ऐसे में संस्कृत, जो समस्त भाषाओं की जननी और विश्व की प्राचीनतम भाषा है, का सम्मान अपेक्षित है। संस्कृत ही एकमात्र ऐसी भाषा है जिसके शब्द मूलत: जर्मन, लेटिन आदि विदेशी भाषाओं में भी मिलते हैं। ऐसे में विश्वभाषा वर्ष के अवसर पर हम संस्कृत के जरिए पूरे विश्व को जहां एक सूत्र में बांध सकते हैं, वहीं आपसी विचार-विनिमय का माध्यम भी बना सकते हैं।

यह हमारे लिए गौरव की बात है कि हाल ही में ऋग्वेद की पांडुलिपियों को विश्व सांस्कृतिक धरोहर का दर्जा दिया गया है। ऋग्वेद विश्व का प्राचीनतम ग्रंथ है। संस्कृत का महत्व विदेशों में, यूरोप व दक्षिण-पूर्व एशिया में विद्वानों ने पहचाना और सर विलियम जोंस, मैक्समुलर, गेटे व चाल्र्स विल्किंस जैसे अनेक विद्वानों ने वेदों तथा संस्कृत ग्रंथों का अध्ययन, मनन व शोध किया। भारतीय सभ्यता व संस्कृति का अध्ययन संस्कृत भाषा के ज्ञान बिना संभव नहीं। संस्कृत ग्रंथों में वैमानिकी, ज्योतिष, खगोलीय, गणित, आयुर्वेद समेत तमाम विषयों का विशद उल्लेख मिलता है। ऐसे में विदेशी विद्वानों की रुचि शुरू से ही संस्कृत भाषा में रही है। संस्कृत भाषा ने हजारों मीलों की दूरियां मिटाकर जातिगत, धर्मगत व भाषागत भेदभावों को दूर किया है।

देश के पूर्व राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम का ग्रीस के राष्ट्रपति माननीय श्री कोरोलोस द्वारा स्वागत संस्कृत के शब्दों में किया जाना हमारे लिए सचमुच गर्व की बात है। एक ओर जहां विदेशों में संस्कृत का सम्मान हो रहा है, वहीं हम संस्कृत बोलने में झिझक महसूस करते हैं। विदेश में संस्कृत भाषा में बढ़ती रुचि को देखते हुए भारत के कई शिक्षकों ने इंटरनेट द्वारा संस्कृत सिखाने की सराहनीय पहल की है, जिसमें मध्यप्रदेश के एक शिक्षक ने टेली कांफ्रेंसिंग के जरिए विदेशियों को संस्कृत सिखाना प्रारंभ किया है।

केंद्रीय संस्कृति व पर्यटन मंत्रालय के माध्यम से ही डॉ. हरीसिंह गौर यूनिवर्सिटी में भी लगभग २क् हजार से भी ज्यादा पांडुलिपियों का इलेक्ट्रॉनिक डाटाबेस तैयार किया गया है। यह संस्कृत भाषा का विश्व में सबसे बड़ा डाटाबेस है। इससे संस्कृतप्रेमियों को किताबों के पन्ने पलटने की जरूरत नहीं पड़ेगी। इसके पूर्व भी संस्कृत को रोचक और सरल बनाने के लिए कई अभिनव प्रयोग किए गए हैं। अमेरिका के कुछ युवाओं ने एक वेबपोर्टल शुरू किया है। इसमें कुछ फिल्मी गानों व फिल्मों का वीडियो संस्कृत भाषा में तैयार किया गया। यूनिवर्सिटी ऑफ मैरीलैंड के छात्र समूह व संस्कृत भारती के सहयोग से एक वेबसाइट के जरिए भी संस्कृत को सरल, सहज व रोचक बनाते हुए आम बोलचाल की भाषा बनाने की कोशिश जारी है। विदेशियों में दिनोंदिन संस्कृत भाषा के प्रति बढ़ती रुचि, लगन व महत्वाकांक्षा को देखते हुए निश्चित ही हमें भी संस्कृत से निकटता बढ़ानी चाहिए। ये बात सच है कि वैश्वीकरण के दौर में मौजूदा जरूरत को देखते हुए अंग्रेजी का ज्ञान भी बेहद जरूरी है, पर इसके साथ ये भी जरूरी है कि हम अपनी देवभाषा संस्कृत की महत्ता को भी समझें।

केंद्र सरकार द्वारा संस्कृत की शिक्षा के लिए छात्रवृत्ति दी जाती है, परंतु कई जगह संस्कृत के छात्र नहीं मिलने से केंद्र सरकार को यह राशि वापस लौटा दी जाती है। छात्रों की कमी का मुख्य कारण संस्कृत के प्रति अभिभावकों और विद्यार्थियों का उपेक्षापूर्ण रवैया है। संस्कृत के बारे में पर्याप्त प्रचार का न होना भी इसका एक कारण है।

अंग्रेजी के बढ़ते प्रचार-प्रसार व संस्कृत को केवल पंडितों की भाषा समझने की हमारी मानसिकता के चलते हमारे समक्ष कुछेक वर्षो में ऐसी स्थिति भी आ सकती है कि शादी-ब्याह, पूजा-पाठ के लिए पंडित भी खोजे नहीं मिलेंगे। वहीं शासन की उपेक्षापूर्ण नीति के चलते जहां एक ओर अंग्रेजी में स्नातकोत्तर शिक्षकों को पदोन्नति मिल जाती है, वहीं हिंदी व संस्कृत में पीएचडीधारी शिक्षक रिटायरमेंट तक पदोन्नति की आस लगाए बैठे रहते हैं। संस्कृत शिक्षकों को भी विशेष वेतन वृद्धि अथवा पदोन्नति मिलने से संस्कृत के प्रति लोगों में रुचि व सम्मान की भावना जागेगी।

बदलती मानसिकता व आधुनिकीकरण के दौर में समाज में बढ़ती संस्कारहीनता को रोकने में भी संस्कृत ही संस्कारवान पीढ़ी को निर्मित कर सकती है। पर ये तभी संभव हो सकेगा जबकि इस पुनीत कार्य में छात्र, शिक्षक, प्रशासन के साथ अभिभावक भी पूरा सहयोग करें। संयुक्त राष्ट्र द्वारा घोषित विश्वभाषा वर्ष २क्क्८ को मनाना तभी सार्थक कहा जाएगा जबकि हम अपने पूर्वजों की भाषा संस्कृत के प्रति सजग बनें।

-लेखिका स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।





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