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फांसी से क्या हासिल होगा!

दृष्टिकोण. फांसी से क्या हासिल होगा! पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश स्वर्गीय दोराब पटेल अकसर कहा करते थे कि यदि उन्हें फिर से जज बनने का मौका मिले, तो वे कभी किसी को मृत्युदंड नहीं देंगे। न्यायाधीश पटेल, जिन्होंने वर्ष 1981 में जनरल जिया-उल-हक के सैन्य शासन के विरोध में पद से त्यागपत्र दे दिया था, पाकिस्तान के मानवाधिकार आयोग के संस्थापक सदस्यों में से एक थे। एमनेस्टी इंटरनेशनल और ह्यूमन राइट्स वॉच जैसे अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त संगठनों की तरह पाकिस्तानी मानवाधिकार आयोग ने ऐसा रुख अख्तियार किया, जो मौत की सजा के खिलाफ इसे और संबल प्रदान करता है। पाक मानवाधिकार आयोग ने वर्ष 1986 में अपनी पहली सभा में तीन प्रस्ताव पारित किए : चुनाव करवाना, पृथक चुनावी तंत्र को खत्म करना और मौत की सजा को समाप्त करना।

दुर्भाग्य से पाकिस्तान की गिनती उन बासठ देशों में होती है जहां आज भी मृत्युदंड का प्रावधान है, जबकि 135 देशों ने इसे कानून और व्यावहारिक चलन से बाहर कर दिया है। पाकिस्तानी मानवाधिकार आयोग ने अपनी रिपोर्ट ‘स्लो मार्च टू गैलोज(2007)’ में बताया है कि पाकिस्तान में भारी संख्या में कैदी फांसी का इंतजार कर रहे हैं, जिनमें से 7400 से ज्यादा पुरुष और 36 महिलाएं हैं। इनमें से ज्यादातर गरीब हैं। एमनेस्टी ने यह नोट किया है कि अपराध रोकने की दिशा में मृत्युदंड दूसरी सजाओं से ज्यादा असरकारक नहीं है। कनाडा में वर्ष 1975 से लेकर अब तक मानव हत्या की दर में 40 फीसदी तक कमी आई है, जहां 1976 में मृत्युदंड को खत्म कर दिया गया।

18 दिसंबर 2007 में संयुक्त राष्ट्र महासभा में विश्वव्यापी स्तर पर मृत्युदंड के स्थगन का प्रस्ताव भारी अंतर से पारित किया गया। तब से इस प्रस्ताव का विरोध किया जा रहा है और इस सितंबर में भी बहस जारी रहेगी। पाकिस्तान और भारत जैसे देशों में त्रुटिपूर्ण जांच और कानूनी तंत्र के चलते एक-दूसरे देशों के कैदियों के लिए परिस्थितियां तब और विकट हो जाती हैं जब उन्हें आतंकवाद के आरोप में गिरफ्तार किया जाता है। जैसा कि पाकिस्तान मानवाधिकार आयोग की हालिया प्रेस रिलीज में कहा गया है- ‘भारत और पाकिस्तान के आपसी संबंधों ने दक्षिण एशिया की समूची आबादी को काफी हद तक प्रभावित किया है। इन दो पड़ोसी मुल्कों के बीच तनाव पनपने का एक बड़ा कारण एक-दूसरे के कैदियों को दी जा रही भयावह यातनाएं हैं।’

सरबजीत सिंह को जासूसी और आतंकवाद फैलाने के आरोप में 1990 में गिरफ्तार किया गया और 1991 में उसे मौत की सजा सुनाई गई। पंद्रह साल बाद, 2006 में सुप्रीम कोर्ट ने भी इस सजा को बरकरार रखा। उम्रकैद में 14 साल की सजा होती है। सरबजीत पहले ही 18 साल की कैद काट चुका है और वह भी ज्यादातर मौत की सजा के इंतजार में। इस वर्ष 3 मार्च को एक और भारतीय कैदी कश्मीर सिंह(जिसे जासूसी के आरोप में गिरफ्तार किया गया था) की हाई-प्रोफाइल रिहाई ने दूसरे कैदियों लिए भी उम्मीद जगाई। पाकिस्तान द्वारा सिंह की बिना शर्त और एकतरफा रिहाई एक उदार पहल थी जिसने भारत से भी ऐसी ही प्रतिक्रिया की उम्मीद जगाई। पाकिस्तान के कार्यवाहक मानवाधिकार मंत्री अंसार बर्नी ने वाघा सीमा पर कश्मीर सिंह को भावुक विदाई देते हुए पत्रकारों से ऐसी ही बात की।

दुर्भाग्य से भारत पहुंचने के तुरंत बाद कश्मीर सिंह ने यह मान लिया कि वह अपने देश का जासूस था। हालांकि बाद में वह अपनी बात से मुकर गया, लेकिन नुकसान तो हो चुका था। हालांकि भले ही वह गुनहगार हो लेकिन उसकी पैंतीस साल की कैद सजा के लिहाज से काफी है। परिस्थितियां तब और बिगड़ीं कि जहां कश्मीर सिंह को फूलमालाओं से लादकर सम्मान के साथ वाघा सीमा के पार भेजा गया, वहीं इसके एक हफ्ते बाद ही नई दिल्ली ने एक पाकिस्तानी विचाराधीन कैदी खालिद महमूद की लाश भेज दी, जो १२ फरवरी २क्क्८ को मर चुका था। भारत ने उसे किसी तरह की यातना देने से इनकार किया और सुबूत के तौर पर उन अस्पतालों की सूची पेश की, जहां उसका उपचार किया गया, लेकिन यह नहीं बताया गया कि उसे किस तरह की बीमारी थी।

भारतीय अधिकारियों का कहना है कि जिस दिन महमूद की मौत हुई, उसी वक्त उन्होंने पाकिस्तान को सूचित कर दिया था, लेकिन उसकी पार्थिव देह को दफनाने के लिए पाकिस्तान भेजने का आग्रह तीन हफ्ते बाद प्राप्त हुआ। संयोग से इसी के कुछ समय बाद सरबजीत की फांसी की तारीख तय कर दी गई। हालांकि सिंह के वकील, एडीशनल एडवोकेट जनरल पंजाब राणा अब्दुल हमीद का कहना है कि यह फरमान रुटीन कार्यवाही के तहत ही जारी किया गया और महमूद की मौत से इसका कोई लेना-देना नहीं है। वह आगे कहते हैं कि अब यह ‘दो सरकारों के बीच का मामला है जिसे उन्हें मानवतावादी नजरिए से हल करना होगा।’

दोनों सरकारें इस पहलू से भलीभांति अवगत हैं। 19 मार्च को पाकिस्तान द्वारा सरबजीत सिंह को एक महीने की मोहलत देने के साथ-साथ भारत ने भी इसके दो दिन पहले ही एक पाकिस्तानी कैदी जमाल कुरैशी को रिहा किया जिसे वर्ष 2005 में जाली मुद्रा रखने के आरोप में उत्तरप्रदेश में गिरफ्तार किया गया था। कैदियों की सुविधा के लिहाज से संस्थागत प्रणालियों पर पहले ही काम चल रहा है, मसलन काउंसलर सेवा संबंधी समझौता, जिसकी काफी जरूरत है। गौरतलब है कि कैदियों को काउंसलर की सेवाएं देने के संबंध में दोनों सरकारों की रफ्तार फिलहाल काफी धीमी है। कैदियों के संबंध में नई गठित संयुक्त न्यायिक समिति की बैठक हाल ही में नई दिल्ली में हुई और अप्रैल में पाकिस्तान में इसकी फिर मीटिंग होगी।

सरबजीत को फांसी देने से यह प्रक्रिया पटरी से उतर सकती है और दूसरे कैदियों की उम्मीदों पर तुषारापात हो सकता है। पाकिस्तान ने मौजूदा सिस्टम से परे जाकर कश्मीर सिंह को स्वेच्छा से रिहा कर दिया। भारत की ओर से भी ऐसी सकारात्मक प्रतिक्रिया संबंध सुधार की दिशा में काफी असरकारी साबित होगी। इसी बीच, सरबजीत सिंह की बहन और दो पुत्रियों ने पाकिस्तान के राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ और नई सरकार से अपील कर उससे मिलने की इजाजत मांगी है। बेहतर यही होगा कि उसकी जान बख्श दी जाए।





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