सम्पादकीय. अमेरिका के साथ होने वाले भारत के परमाणु करार पर वामदलों द्वारा चाहे जितनी हाय-तौबा मचाई जा रही हो, पर उसका सीधा संबंध देश की ऊर्जा जरूरतों से भी जुड़ता है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने एक बार फिर ऊर्जा संकट पर जोर देते हुए इसके हल के तौर पर परमाणु ऊर्जा के महत्व को रेखांकित किया है।
असल में सरकार शुरू से ही करार के इस पक्ष को सामने रखती रही है, लेकिन बहस का केंद्र बिंदु हमेशा फिसलकर अमेरिका और उसके साथ सामरिक रिश्तों पर ही जाता रहा है। पिछले दिनों कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने भी एक रैली को संबोधित करते हुए परमाणु करार और देश के विकास के लिए परमाणु ऊर्जा की जरूरतों को रेखांकित करते हुए करार विरोधियों को विकास विरोधी करार दिया था। लेकिन यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि कांग्रेस पार्टी या उसकी सरकार ऊर्जा संकट और उसके निदान को परमाणु करार का मुद्दा नहीं बना पाई। इतना तो पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री भी मानते हैं कि बिना परमाणु ऊर्जा के त्वरित विकास संभव नहीं है। यह अलग बात है कि वे पार्टी लाइन से हटकर परमाणु करार का समर्थन नहीं कर सकते।
लेकिन लगता है किऊर्जा संकट से निबटने के लिए कोई वैकल्पिक उपाय न निकलता देख सरकार अमेरिका के साथ परमाणु करार को आगे बढ़ाने के बारे में सोचने लगी है। ईरान के साथ गैस पाइपलाइन का मामला भी खटाई में पड़ा दिखता है, वरना उससे भी कुछ समाधान निकलने की उम्मीद हो सकती है। पिछले दिनों करार मसौदे को वाम दलों के साथ बनी समन्वय समिति से अग्रसारित करवाने के बाद विदेशमंत्री प्रणब मुखर्जी अमेरिकी विदेशमंत्री कोंडोलिजा राइस के साथ आगे की बातचीत कर रहे हैं, जिसमें परमाणु ऊर्जा केंद्रीय बिंदु के रूप में उभरकर सामने आई है। इस मुहिम के साथ यदि वित्तमंत्री पी चिदंबरम के ताजा वक्तव्य को जोड़कर देखें तो पूरा चित्र स्पष्ट हो जाता है। वित्तमंत्री की शिकायत थी कि विकास के लिए सरकार जो भी उपाय करने की कोशिश करती है, संसद के साठ लोग उसे अवरुद्ध करने के लिए उठ खड़े होते हैं। यह इशारा निश्चय ही वामदलों की ओर था। इससे सरकार के बढ़े हुए आत्मविश्वास का भी पता चलता है कि वह जरूरत पड़ने पर वाम विरोध को नजरअंदाज भी कर सकती है।
देश की ऊर्जा जरूरतों के महत्व को कोई भी नजरअंदाज नहीं कर सकता। यदि परमाणु करार से इसकी भरपाई होती है, तो उसे करने में कोई हर्ज नहीं है। दुनिया के विकसित देशों का इतिहास इस बात का गवाह है कि उन्होंने परमाणु ऊर्जा के जरिए विकास की कैसी रफ्तार बढ़ाई है। करार के बाद हम सिर्फ अमेरिका से ही नहीं, तमाम ऊर्जा-संपन्न देशों से परमाणु ऊर्जा प्राप्त कर सकते हैं।