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Chandigarh Chandigarh चंडीगढ़. ‘मौत को कोई नहीं टाल सकता। यह तो जब लिखी है तब आएगी ही। अगर आप चाहते हैं कि मरने के बाद अपने प्रियजन को किसी की आंखों में देख सकें तो नेत्रदान करिए, इससे अच्छा पुण्य और कोई नहीं हो सकता है।’ ग्रीफ काउंसलर अमृतपाल बड़े ही धैर्य से पीजीआई के मॉर्चरी के बाहर एक डेड बॉडी के साथ आए परिजनों को मरने वाले की आंखें दान करने के लिए प्रोत्साहित कर रहे हैं।
वहीं जीएमसीएच-32 की मॉर्चरी के बाहर खड़े जगदीप एक डेड बॉडी के साथ आए परिजनों से कह रहे थे, ‘एक डेड बॉडी की आंखें दो लोगों को खूबसूरत दुनिया दिखा सकती है और मौत के बाद भी अपने परिजन को किसी की आंखों में देखने से अच्छा अनुभव कोई और नहीं हो सकता।’
चैलेंज है मृतक के परिजनों की काउंसलिंग : पीजीआई मॉर्चरी में तैनात अमृतपाल कहते हैं, प्रियजन की मौत से परिजन पहले ही दुखी होते हैं, ऐसे में उन्हें आंखे दान करने के लिए समझाना आसान नहीं होता। उनको मोटीवेट करने के लिए पहले भूमिका बनानी पड़ती है, उनके साथ मिक्स होना पड़ता है, फिर माहौल देखकर काउंसलिंग की जाती है।
उनके गुस्से को सहना पड़ता : काउंसलिंग के दौरान कई बार हमें परिजनों के गुस्से का सामना करना पड़ता है। आंखें दान करने की बात सुनते ही कई बार परिजन भड़क जाते हैं।
अंधविश्वास भी आता है आड़े: जगदीप कहते हैं कि अवेयरनेस की कमी और अंधविश्वास के चलते भी लोगों को आई डोनेशन के लिए मनाना मुश्किल होता है। लोगों में यह धारणा है कि आंखें दान करने से व्यक्ति अगले जन्म में अंधा पैदा होगा।
100 में से चार होते हैं तैयार : जगदीप कहते हैं कि जीएमसीएच-32 की मॉर्चरी में हर महीने करीब 100 डेड बॉडी आती है, जिनमें से 3 से 4 ही डोनेशन के लिए तैयार होते हैं। अमृत पाल ने बताया कि पीजीआई में हर महीने करीब 150 डेडबॉडीज में से 18 से 20 के परिजन इसके लिए तैयार होते हैं।
लीगल प्रॉब्लम भी आती है: ग्रीफ काउंसलर अमृतपाल कहते हैं, आई डोनेशन में लीगल प्रॉब्लम आती है। बहुत से केसों में परिजन तैयार हो जाते हैं, लेकिन पुलिस और हॉस्पिटल की औपचारिकताएं पूरी करने में इतना समय लग जाता है कि आंखें ट्रांसप्लांट के लायक नहीं रह जाती हैं।
सोशल वर्क में डिग्री या डिप्लोमा जरूरी: ग्रीफ काउंसलर बनने के लिए सोशल वर्क में डिग्री या डिप्लोमा होना चाहिए। व्यक्ति की कम्युनिकेशन स्किल्स ऐसी होनी चाहिए कि हर स्थिति को हैंडिल कर सके।