दृष्टिकोण. तिब्बतियों के विद्रोह की आग तिब्बत के सुदूरवर्ती इलाकों और यहां तक कि हान प्रांतों में सम्मिलित पारंपरिक तिब्बती क्षेत्रों से बाहर तक फैल चुकी है। चीन ने बलपूर्वक इसे कुचलते हुए तिब्बत के पठार को बाकी दुनिया से अलग-थलग कर दिया, अनेक विद्रोहियों को मार डाला और मनमाने ढंग से जारी इस कार्रवाई के तहत कई लोगों को गिरफ्तार कर लिया। यह बगावत ऐसे शासन के लिए जोरदार झटका है, जो पिछले ५७ साल से तिब्बतियों के खिलाफ दमन चक्र चला रहा है।
यह विद्रोह चीन के सर्वसत्तावादी तंत्र के समक्ष ऐसे वर्ष में खुली चुनौती पेश कर रहा है, जब बीजिंग ओलिंपिक इसकी आर्थिक उपलब्धियों का शोकेस बनने जा रहा है। यह विद्रोह कम्युनिस्ट चीन के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ है। तिब्बत में दशकों से चल रहे उत्पीड़न के दौर (जैसे मठों का विध्वंस, बौद्ध भिक्षुओं और भिक्षुणियों को जेल भेजना, तिब्बती बौद्ध धर्म के मामले में एक नास्तिक राज्य का मनमाने ढंग से दखलंदाजी और बीजिंग द्वारा मान्यता प्राप्त पंचेन लामा को प्रतिस्थापित करना) के बावजूद अंदर ही अंदर विद्रोह की आग सुलगती रही। वास्तव में इस तरह की दमनपूर्ण कार्रवाइयों और तिब्बत की आर्थिक बदहाली ने तिब्बतियों में अपनी अलग पहचान कायम करने और आजादी के लिए लड़ने की भावना को और गहरा किया।
चीन के राष्ट्रपति हू जिंताओ, जिन्होंने1989 में तिब्बतियों की पिछली बगावत को कुचलने के लिए तिब्बत में मार्शल-लॉ प्रशासक की भूमिका निभाई थी, उनके लिए फिर पहले जैसे ही हालात हो गए हैं। हालिया गदर ऐसे समय में हुआ है, जब जिंताओ राष्ट्रपति के तौर पर फिर से चुने गए हैं। तिब्बत में चीनी लोगों को बसाने की इस नीति से आज तिब्बती संस्कृति पर इस कदर खतरा बढ़ गया है, जैसा पिछले दशकों के उत्पीड़न के बावजूद कभी देखने में नहीं आया है। हालांकि चीनी मायथोलॉजी के मुताबिक तिब्बत ऐतिहासिक रूप से चीन के अधीन एक राज्य रहा है, जबकि सच यही है शुरुआती काल से ही तिब्बत का स्वतंत्र राजनीतिक अस्तित्व और चीन से बिलकुल जुदा संस्कृति रही है। ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी से लेकर तेरहवीं सदी तक चीन और तिब्बत के बीच बैर रहा। वास्तव में सातवीं से नौवीं सदी के दरमियान तिब्बत के साम्राज्य का विस्तार पूरे मध्य एशिया तक हुआ, जिसमें आधुनिक चीन का भी काफी हिस्सा सम्मिलित था।
तिब्बत तभी चीन का हिस्सा था, जब वहां हान वंश का शासन नहीं था। पहला मंगोल युआन का राजवंश था, जिसका शासनकाल 1279 से 1368 तक रहा। मंगोलों ने चीन पर विजय हासिल की और तिब्बत बिना आक्रमण के ही इसके अधीन हो गया। इस तरह दोनों युआन राजवंश के अधीन हो गए। सत्रहवीं सदी के उत्तरार्ध में चीन को फिर विदेशियों ने जीत लिया और इस बार विजेता थे मंचूस।
मंचू क्विंग राजवंश ने आक्रामक तरीके से पड़ोसी गैर-हान क्षेत्रों पर भी कब्जा जमा लिया। उसने तिब्बत को भी अपने शासन के अधीन लाने के लिए उस पर दबाव डाला। कम्युनिस्ट शासन के अंतर्गत चीन में उन सभी क्षेत्रों पर अपने अधिकार की भावना पुन: बलवती होती गई, जिस पर कभी चीन के राजवंशांे का आधिपत्य था। तिब्बत के भू-राजनीतिक महत्व के कारण ही चीन ने तिब्बत को अपने में मिला लिया। जबकि यह बात स्पष्ट है कि १९५क् तक तिब्बत का स्वतंत्र अस्तित्व था और तिब्बत का भूभाग लगभग चीन का एक-चौथाई था।
तिब्बत के पतन से चीन के लंबे इतिहास में पहली बार इसकी सीमा का विस्तार भारत, भूटान और नेपाल तक हो गया। इसके बाद अक्साई चिन पर कब्जा जमाने से चीन पाकिस्तान के साथ भी जुड़ गया। तिब्बत में फैले खनिज और जल के विशाल संसाधनों पर आज चीन का नियंत्रण है। तिब्बत में न सिर्फ 126 तरह के खनिज पाए जाते हैं, वरन यहां से ब्रrापुत्र, सतलुज और इंडस जैसी नदियों का भी उद्गम है। इन नदियों पर बांध बनाकर बीजिंग भारत के खिलाफ पानी को भी एक राजनीतिक औजार की तरह इस्तेमाल करने की कोशिश में है।
वास्तव में 1951 में तिब्बत को अपने साथ जोड़ने के ग्यारह साल बाद चीन ने भारत पर हमला किया। भारत के लिए इस जंग के घाव अभी भी हरे हैं क्योंकि तब से चीन लगातार भारतीय अधिकार क्षेत्र के कुछ इलाकों पर आक्रामक ढंग से अपना दावा जताता चला आ रहा है। मूल जम्मू-कश्मीर के पांचवे हिस्से पर कब्जा जमाने के अलावा चीन अरुणाचल प्रदेश पर भी हान से किसी जुड़ाव की वजह से नहीं, वरन यहां पर तिब्बती बुद्धिज्म के प्रभाव के चलते अपना दावा जताता है। फिर चीन ने तिब्बत के दो क्षेत्रों- एम्डो(मौजूदा दलाई लामा का जन्मस्थान) और खाम को तिब्बत से हटाकर हान प्रांतों के साथ मिला लिया।
चीन बार-बार ऐसे लोगों को रौंदता रहा रहा है, जो संतुलन या संयम की नीति अपनाते हैं। वर्ष 1987 में दलाई लामा ने चीनी शासन के खिलाफ तिब्बतियों के आजादी के संघर्ष को चीन के तहत ही स्वायत्तता हासिल करने की लड़ाई में बदल दिया। यदि दलाई लामा ने इस बदलाव से कुछ हासिल किया है, तो वह यह कि इसके बाद से ही वे चीन की आलोचना का केंद्र बने हुए हैं। दलाई लामा द्वारा सार्वजनिक रूप से तिब्बत की आजादी के मसले को छोड़ देने संबंधी सार्वजनिक स्वीकारोक्ति से असंतुष्ट बीजिंग अब इस बात पर जोर दे रहा है कि वे इस बात को भी मान लें कि तिब्बत हमेशा से चीन का हिस्सा था।
यद्यपि शांत बुद्ध संस्कृति वाले तिब्बत में मचा रक्तपात यह दर्शाता है कि तिब्बत चीन के समक्ष गंभीर चुनौती पेश कर रहा है। इस मसले पर चीन ने जिस तरह त्वरित रूप से सख्त प्रतिक्रिया दी है उससे पता चलता है कि बीजिंग भी यह मानता है कि तिब्बत को लेकर यह ‘जीवन-मरण का संघर्ष’ है। मौजूदा घटनाक्रम तिब्बत पर चीन के रुख को और सख्त करेगा। लेकिन इस तरह की सख्ती सिर्फ बढ़ती चुनौती को ढांक सकती है, इससे पार नहीं पा सकती। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि 1989 में हुए तिब्बती विद्रोह को कुचलने के दो महीने बाद थियानमन चौक पर नरसंहार हुआ। चीनी सुरक्षा बलों द्वारा यहां फिर से नियंत्रण स्थापित करने के बाद भी काफी समय तक इस तिब्बती क्रांति की गूंज सुनाई देगी।
-लेखक सामरिक मामलों के विशेषज्ञ हैं।