HomeVichaar Vichaar

समस्याग्रस्त बच्चों के अभिभावकों को चाहिए सही परामर्श

परिवार और समाज के ढांचे में होने वाले परिवर्तन किसी भी बच्चे या किशोरवय युवाओं के जीवन पर सबसे ज्यादा असर डालते हैं, क्योंकि उनके लिए उनके माता-पिता या अभिभावक ही सबसे पहले प्रभावी ‘मॉडल’ होते हैं।

आमतौर पर देखा गया है कि समस्याग्रस्त बच्चों में पाई जाने वाली मानसिक समस्याओं के लिए पारिवारिक झगड़े, परिवारों का टूटना, माता-पिता का अलग होना और लालन-पालन में कमी जैसे कारण जिम्मेदार होते हैं। पिछले दिनों कई ऐसे मामले देखे गए जहां बच्चों द्वारा किए गए आपराधिक कृत्यों के पीछे उनके माता-पिता का प्रभाव प्रमुख कारण था। इसके अलावा बच्चों को जरूरत से ज्यादा सुरक्षा देना, उन्हें नकारना, उनसे ज्यादा अपेक्षा रखना, उन्हें दी गई सुविधाओं में कमी करना, गैर जरूरी सजा या इनाम जैसे कारण भी उनमें भावनात्मक असुरक्षा, असंतुलन जैसे विकारों को जन्म देते हैं। ऐसे बच्चे अवसाद(डिप्रेशन) से ग्रस्त हो सकते हैं और उन्हें झूठ बोलने, चोरी करने, काम या स्कूल से जी चुराने या एग्रेशन जैसे व्यवहार की ओर प्रेरित कर सकते हैं।

यह सब बातें तो सर्वविदित हैं। इनमें से सब पर बहुत काम और अनुसंधान हुआ है, परंतु ऐसे भी उदाहरण हैं जिनमें माता-पिता द्वारा लालन-पालन के अलग तरीकों की वजह से बच्चों में असामान्य व्यक्तित्व और व्यवहार की घटनाएं देखी गईं। इनमें से प्रमुख है अभिभावकों द्वारा मशीनी तरीके से अपने बच्चों को पालना। इस तरह पले-बढ़े बच्चे रोबोट की तरह व्यवहार करते हैं और उनमें भावनात्मक गर्माहट नहीं होती। ऐसे बच्चे से आप क्या उम्मीद कर सकते हैं जिसे सुबह क्रैश में भेज दिया जाता है और शाम को वापस लाकर एक नौकर के हवाले कर दिया जाता है, जो उसे खिलाकर सुला दे। थोड़े बड़े होने पर उसे प्री-नर्सरी स्कूल में दिन भर बिताना होगा और उसकी मां की केवल यही रुचि होगी कि किसी आगंतुक के सामने वह किसी कविता की लाइनें सुना दे। थोड़ा और बड़े होने पर उन्हें विदेश भेज दिया जाता है, जहां वे अपनी पढ़ाई पूरी करके नौकरी या व्यवसाय में लग जाते हैं और फिर वापस आना पसंद नहीं करते। उनके अभिभावक यह कहने में गर्व महसूस करते हैं कि उनके बच्चे विदेश में हैं।

ऐसे ही एक बच्चे का मामला लें, जिसकी मां आईएएस अधिकारी थी और उनका दावा था कि वे दिल्ली में सर्वश्रेष्ठ माताओं में एक हैं। उनका बच्चा आईक्यू के पैमाने पर 130 अंक प्राप्त कर ‘जीनियस’ की श्रेणी में था, पर अपनी क्लास में उसके बहुत खराब नंबर आए थे। इससे आहत होकर उस महिला ने नई दिल्ली के एम्स में बच्चे का मनोवैज्ञानिक टेस्ट कराया, जिसमें पता चला कि बच्चे को अपनी मां के प्रति नकारात्मक धारणा थी। जब वे मेरे पास आईं तो मैंने धैर्य रखने की सलाह देकर उनसे पूछा कि उनकी दिनचर्या क्या है। उनका जवाब था सबेरे देर से उठकर 11 बजे तक ऑफिस जाना, शाम को क्लब होते हुए देर से आना। बच्चा सुबह नौकर द्वारा बनाया नाश्ता करके स्कूल में सो जाता था और शाम को ट्यूशन और खेलने के बाद खाना खाकर अपने कमरे में सो जाता था। मेरे इस सवाल का कि वे अपने बच्चे के साथ प्यार भरे कुछ पल कब बिताती हैं, उनके पास कोई जवाब नहीं था।

दूसरी ओर ऐसे अभिभावक भी हैं जो अपने बच्चों को जरूरत से ज्यादा प्यार और सुरक्षा देते हैं, जिसके चलते उनका समुचित रूप से व्यक्तित्व विकास नहीं हो पाता। एक कहावत है ‘बड़े बाप के बेटे हैं, जबसे पैदा हुए लेटे हैं।’ ऐसे ही गलत पालन-पोषण का परिणाम हैं वे बच्चे, जो छोटी उम्र से ही ताकत के प्रतीक हथियार या भाषा का इस्तेमाल करने लगते हैं। शुरू में तो सबको बड़ा अच्छा लगता है, पर जैसे-जैसे बच्चे बड़े होते हैं, यही आदत विकृति में बदल जाती है।

बच्चों के पालन में पुरस्कार और सजा का भी बड़ा महत्व है। हमारे व्यक्तित्व के विकास पर इनका इतना प्रभाव पड़ता है कि हममें से अधिकांश अपने व्यवहार में इन्हें जीवन भर इस्तेमाल करते हैं। मिसाल के तौर पर अकसर ऐसे मामले मनोचिकित्सकों के पास आते हैं, जिनमें बच्चे जरा सी बात पर रोने लगते हैं या खाने से इनकार करते हैं। ऐसा इसलिए होता है कि रोना शुरू करते ही बच्चे को विशेष ध्यान प्राप्त होने लगता है या खाना न खाने पर उसे हर तरह से मनाने की कोशिश होती है या प्रलोभन दिए जाते हैं। ऐसे मामले यदि समय रहते न रोके गए तो बड़े होने पर ऐसे बच्चे जिद्दी या हमेशा ध्यान आकर्षित करने की हरकतों के आदी हो जाते हैं।

इन सबके मद्देनजर यह जरूरी है कि बच्चों की बढ़ती उम्र के दौरान उन पर ज्यादा से ज्यादा ध्यान और समय दिया जाए। साथ ही परामर्श केंद्र और मनोचिकित्सा केंद्र भी चलाए जाने जरूरी हैं। यह परामर्श बच्चों के साथ-साथ माता-पिता के लिए ज्यादा आवश्यक है। अधिकतर मामलों में आखिरकार यही सामने आता है कि समस्याग्रस्त बच्चे नहीं, उनके माता-पिता होते हैं। परामर्श और संभावित मनोचिकित्सा की जरूरत पहले शायद उन्हें ही ज्यादा है।
-लेखक प्रख्यात सलाहकार क्लीनिकल मनोचिकित्सक हैं।





अपने विचार यहां लिखें
नाम:
ईमेल आईडी:
भाषा चुनॆ
हिन्दी रॊमन‌ हिन्दी फॊनॆटिक English
विचार:
कोड: