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दर्शकों की भागीदारी बनाती है रंगमंच को क्रियाशील

जर्मन लेखक जे. वोल्फ गैंग वॉन गोथे (1749-1832) ने सृजनात्मक ऊंचाइयों से लैस ड्रामेटिक पोएम ‘फॉस्ट’ (1808-32) में एक मिथ का जिक्र किया है, जिसे आधार बनाकर मालरेव ने ‘ डॉक्टर फॉस्टस’ लिखा। फॉस्टस ने शैतान से कहा कि उसे सर्वश्रेष्ठ ज्ञान, सारी शक्ति, सारा सुख और संपन्नता मिल जाए। शैतान ने एक सौदा किया और कहा कि ठीक है, मैं अपने नौकर मैफिस्टोफिलीज को तुम्हारे पास छोड़ देता हूं, यह सब कुछ लाकर तुम्हें देगा, लेकिन शर्त यह है कि मृत्यु के बाद तुम्हारी आत्मा को मैं नर्क में ले जाऊंगा। डॉक्टर फॉस्टस ने शर्त मान ली, लेकिन मृत्यु के समय वह बहुत दुखी था कि इतने ज्ञान, सुख और वैभव का क्या लाभ जब आत्मा हमेशा के लिए नर्क में जा रही है।

मनोरंजन के बादशाहों, खेलकूद के सम्राटों और बैडरूम तक घातक-रहस्यमय हस्तक्षेप रखने वाले टेलीविजन के मास्टरमाइंड ने जादुई उपक्रमों के जरिए दर्शकों की बुद्धि और दृष्टि को हर लिया है। अब कौन जाने आत्मा नर्क में जाएगी या नहीं, मृत्यु के समय कोई दुखी होगा या नहीं। लेकिन फिर भी दर्शक सिनेमाई फैंटेसी, टीवी के रियलिटी-क्रुअलिटी शोज के टूल बने हुए हैं। दर्शकों की इसी भूमिका को खेल आयोजनों में भी कैश किया जाएगा।

दरअसल अब पूरी की पूरी ऑडियंस कम्युनिटी ‘थर्ड किड’ बन चुकी है, यानी पहला बच्चा फीडिंग कर रहा है, खुश है। दूसरा भी खुश है कि उसकी भूख मिट रही है और उसे पोषण के लिए दूध मिल रहा है। लेकिन दर्शकों का विराट समूह ‘थर्ड किड’ बना अपनी जगह हो-हो करता, तालियां बजाता उछल रहा है कि कभी उसकी बारी आएगी, उसे भी दूध मिलेगा। इसी बात से वह खुश है। लेकिन एंटरटेनमेंट वर्ल्ड के प्रोड्यूसर्स और परफॉर्मर्स के बाद किसी तीसरे के लिए क्या बचेगा। शायद कुछ फैंटेसी और कुछ झूठे सपने।

एक अजीब तरह की पैसिव रिसेप्टीविटी शरीर और मन का हिस्सा बन रही है और इंजर्ड माइंड्स तैयार हो रहे हैं। हिंसा, सेक्स या पारिवारिक तनाव की हजारों इमेजेज एक साथ आ रही हैं और सब कुछ सहज लग रहा है। यहां तक कि बच्चों को एब्नॉर्मल चीज नॉर्मल लग रही है और वह टीवी स्क्रीन के सामने सम्मोहित से बैठे रहते हैं। इस तरह से बन रहे दिमाग में न तो तर्क उपज रहे हैं, न सवाल उठ रहे हैं। इसलिए जब बहुत गलत या असामाजिक घट चुका होता है, तो ‘स्माल टाइम रिवोल्ट’ होता है, फिर सब कुछ खत्म।

किसी और फैक्टर से कंट्रोल किए जा रहे दर्शक अब भीड़ हैं, लोग हैं, आर्थिक कामयाबी के औजार हैं। दरअसल अब समाज से लोगों का केयरिंग और शेयरिंग का रिश्ता ही खत्म किया जा रहा है, इसलिए सामाजिक सरोकारों की बात भी मनोरंजन की दुनिया में नहीं होती। अब से कुछ साल पहले मीना कुमारी, मधुबाला, आशा पारेख, गुरुदत्त, ऋत्विक घटक, साहिर लुधियानवी, देवआनंद या बाजार की पहचान रखने वाले राज कपूर भी क्रिकेट खरीदते-बेचते तो क्या तब भी हिंदुस्तानी दर्शकों की यही प्रतिक्रिया होती जो आज है?

उस गतिविधि में पूंजी नहीं लगती, जहां दर्शक ‘सामाजिक’ की भूमिका में होता है। थिएटर इसलिए केपिटल-कल्चरल मैप से बाहर है या किसी कोने में है। यह एंटरटेनमेंट पैकेजिंग का पार्ट नहीं है। थिएटर अपने में बड़ी कार्रवाई है, जहां दर्शक मंचीय व्यापार में भावनात्मक रूप से जुड़ते हुए भी क्रियाशील रहता है। जहां वह प्रेक्षक, दर्शक, रसिक, सामाजिक सब कुछ एक साथ है। थिएटर का दर्शक ऐंद्रिक अनुभव के साथ निर्णय लेने की क्षमता रखता है।

वह संपृक्त होने के साथ हर चीज का सामना करने के लिए तैयार रहता है। वह अनुभवों में भागीदारी करता है और इन सबसे बाहर रहकर अध्ययन भी करता है। इसके विपरीत माइंड कैप्चर करने वाले टीवी या फिल्म शो का ‘लाइव’ भी दरअसल फिल्म्ड रहता है, वह लाइव कहां रह गया?

घर में टीवी के रिमोट से बॉक्स आफिस के विंडो तक बुने गए जाल की बुनावट एक जैसी ही है। टीवी का रिमोट हाथ में आते ही आप भले ही दर्शक होते हैं, लेकिन इसे ऑफ करते ही आप कब एक आज्ञाकारी उपभोक्ता के रूप में बदल चुके होते हैं, पता ही नहीं चलता। किसके स्वप्न, संकल्प, संघर्ष की अभिव्यक्ति कौन सा मनोरंजन का माध्यम कर रहा है या स्वप्न ही कितने मौलिक हैं, यह एक बड़ा सवाल है।

यह स्वप्न भी किसी और से निर्मित है। मैच या किसी दूसरे शो में जब भी कुछ दिल को छूता है, मस्तिष्क विश्लेषण करने की स्थिति में आता है, तभी आया कमर्शियल ब्रेक मन को ग्लोबल मार्केटिंग के ‘यूज एंड थ्रो’ के दर्शन से जोड़ देता है। ‘बाजीचा-ए-अत्फाल है, दुनिया मेरे आगे। होता है शब-ओ-रोज तमाशा मेरे आगे।’ यानी दुनिया में जो कुछ हो रहा है, वह मेरे लिए एक तमाशे से ज्यादा हैसियत नहीं रखता क्योंकि इस दुनिया का हर काम मेरे लिए महज बच्चों का खेल है। गालिब की इस बात को ‘इमेजेज’ बेचने वाले अलग ढंग से जानते हैं, इस्तेमाल भी करते हैं और दुनिया को अर्थ देने वाला इंसान सिर्फ तमाशा देखता है।

लेखक युवा संस्कृतिकर्मी हैं।





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