संपादकीय. छठे वेतन आयोग की रिपोर्ट पर पहली प्रतिक्रिया आशानुरूप थी, लेकिन जैसे-जैसे इसके पूरे अंश पढ़े व समझे जा रहे हैं, यह भी साफ हो रहा है कि आयोग के अध्यक्ष जस्टिस(रिटायर्ड) बीएन श्रीकृष्ण ने अपनी सिफारिशों में वेतन वृद्धि ही नहीं, बल्कि केंद्र और राज्य सरकारों के कर्मचारियों की कार्यप्रणाली को बदलने की सोच को भी ध्यान में रखा है। जाहिर है कि अगले साल लोकसभा के संभावित चुनाव की वजह से इस रिपोर्ट के जारी होने के समय को राजनीति से प्रेरित कहा जा रहा है।
लोक-लुभावन रेल बजट, आम बजट व किसानों की कर्ज माफी के बाद इस आयोग की रिपोर्ट से एक सकारात्मक संकेत तो जरूर गया है कि केंद्र सरकार समाज के सभी वर्र्गो के बारे में कुछ न कुछ सोचती व करना चाहती है। इस विचार पर भले ही संदेह न हो, पर लगता है कि इसे जारी करने के समय के पीछे राजनीतिक कारण हो सकते हैं। सरकारी कर्मचारियों द्वारा पहले तो इस पूरी रिपोर्ट का स्वागत किया गया, पर जल्दी ही विरोध के स्वर भी उठने लगे हैं। यहां तक कि केंद्रीय कर्मचारियों के एक संगठन ने तो विरोध में हड़ताल पर जाने की सूचना भी दे दी है।
मुख्यत: विरोध इस बात पर है कि रिपोर्ट में अधिकारी वर्ग के लिए वेतन वृद्धि अधिक की गई है और तृतीय व चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारियों को उस अनुपात में ज्यादा फायदा नहीं मिलेगा। पुलिस सेवा के अधिकारियों ने भी कुछ विसंगतियों की ओर ध्यान आकर्षित किया है। साल भर में छुट्टियों की संख्या कम करने और अन्य भत्तों के सरलीकरण पर भी कुछ विरोध है। सबसे प्रमुख बात जो उठनी चाहिए वह यह है कि क्या केवल वेतन वृद्धि से सरकारी दफ्तरों में भ्रष्टाचार कम हो पाएगा? क्या ज्यादा वेतन-भत्ते मिलने के बाद ज्यादातर कर्मचारी अपना काम बेहतर कुशलता से करने लगेंगे? क्या सरकारी अफसर अपने अधिकारों का दुरुपयोग बंद कर देंगे? इन बातों का जवाब देना आसान नहीं है।
यह जरूरी नहीं कि भ्रष्टाचार केवल कम वेतन या असंतोषजनक कार्य सुविधाओं के कारण पनपता है। यह भ्रष्टाचार का आंशिक कारण हो सकता है। यह दलील कि सरकारी सेक्टर और निजी सेक्टर के वेतन में वर्तमान अंतर को कम होना चाहिए, भी बहुत मायने नहीं रखती। जैसा कि सब जानते हैं, सरकारी नौकरी में वेतन नहीं, बल्कि साथ मिलने वाली अन्य सुविधाओं, अधिकारों और रुतबे का महत्व ज्यादा होता है। इस रिपोर्ट के लागू होने के बाद लगता तो यह है कि सुविधा-अधिकार-रुतबा तो बना ही रहेगा, अब तनख्वाह भी बढ़ जाएगी। सरकारी कर्मचारियों और अधिकारियों के पास खोने के लिए कुछ भी नहीं है।