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राज्यपाल धर्म स्वातंत्र्य विधेयक से असहमत

जयपुर. राज्यपाल शीलेन्द्रकुमार सिंह धर्मांतरण के खिलाफ लाए गए धर्म स्वातंत्र्य विधेयक 2008 से असहमत हैं। उनका मानना है कि सरकार को इस विधेयक को वापस ले लेना चाहिए।

राज्यपाल ने बुधवार को राजभवन में ‘भास्कर’ से विशेष भेंट में बताया कि गुजरात में इस तरह का विधेयक वापस लिया जा चुका है। यहां की सरकार से भी उन्हें आशा है कि वह ये विधेयक वापस ले लेगी। वे इस बात से भी आशान्वित हैं कि गुजरात के प्रभारी रहे भाजपा के वरिष्ठ नेता और अब भाजपा के प्रदेशाध्यक्ष ओमप्रकाश माथुर शायद गुजरात की तरह यहां भी धर्मांतरण विधेयक को वापस लेने के लिए प्रेरित करेंगे।

उन्होंने कहा कि ईसा मसीह से पहले ही ईसाई समुदाय के लोग केरल आ गए थे, तभी से यहां रह रहे हैं। यहां जो भी आता है, यहीं का होकर रह जाता है। लोगों को जाति धर्म के नाम पर बांटना ठीक नहीं है। समाज में एकता बिलों से नहीं, दिलों को जोड़ने से आएगी। उनका कहना था कि मैं राज्य का पहला नागरिक हूं, इसलिए यहां के लोगों के दुख-दर्द को समझना मेरा कर्तव्य है।

विधेयक के प्रावधान

>> प्रलोभन या छल कपट से धर्म परिवर्तन नहीं।
>> इसका उल्लंघन करने पर एक से तीन साल की सजा, 25 हजार तक जुर्माना होगा।
>> नाबालिग, महिला या अनुसूचित जाति जनजाति के मामलों में दो से पांच साल की सजा, 50 हजार रुपए जुर्माना होगा।
>> संस्था या ट्रस्ट ऐसा काम करता पाया गया तो उसका रजिस्ट्रेशन रद्द कर दिया जाएगा।
>> स्वेच्छा से धर्म परिवर्तन करने की सूचना जिला कलेक्टर को एक महीने पहले देनी होगी।
>> यदि कोई अपने मूल धर्म में परिवर्तित होता है तो उसे कोई सूचना नहीं देनी होगी
>> अपराध संज्ञेय व गैर जमानती होगा।
>> अभियोजन की मंजूरी जिला कलेक्टर या एसडीएम स्तर का अधिकारी देगा।

किस मुद्दे पर है विवाद

कोई व्यक्ति अपने मूल धर्म में वापस आता है तो उसे धर्मांतरण नहीं समझा जाएगा। उस पर इस विधेयक के कोई प्रावधान लागू नहीं होंगे।

गुजरात में क्यों हुआ था वापस

गुजरात के समान राजस्थान के बिल में भी ‘अपने मूल धर्म’ से अभिप्राय अपने पूर्वजों के धर्म से माना गया है अर्थात यदि पूर्वजों का धर्म हिंदू रहा है और वे बाद में ईसाई हो गए हैं तो उन्हें पुन: धर्म परिवर्तन द्वारा हिंदू बनाया जा सकता है और इस पर अधिनियम के प्रावधान लागू नहीं होंगे। इस प्रावधान पर ही गुजरात सरकार ने बिल वापस ले लिया।





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