Manoranjan
Cinema
Bollywood Bollywood परदे के पीछे.
निर्माता रवि चोपड़ा के लिए नए निर्देशक विवेक शर्मा ने ‘भूतनाथ’ नामक फिल्म बनाई है जिसमें एक बच्चे और एक भूत की दोस्ती की कहानी है। शाहरुख और जूही अपने बच्चे के साथ एक घर में आते हैं और वहां रहने वाला भूत इसे अपनी जायदाद पर कब्जा करने की हिमाकत मानकर उन्हें डराकर भगाने की कोशिश करता है। बच्चे की मासूमियत और भूत के आक्रोश में भिड़ंत होती है और मासूमियत जीत जाती है। इतना ही नहीं, बच्चा भूत को अपनी मानसिक ग्रंथियों से मुक्ति दिलाता है और उसे मोक्ष प्राप्त होता है।
अजीब बात यह है कि फिल्म के दोनों सितारों अमिताभ और शाहरुख के बीच बहुत कड़वाहट है और कोई मासूम बच्चा इन्हें मित्र नहीं बना पा रहा है। दोनों व्यावसायिक कलाकारों ने साथ में शूटिंग की और फिल्म समय पर बन गई है। मनुष्य भूत को देख नहीं पाता और कड़वाहट के कारण दोनों कलाकारों ने एक-दूसरे को अनदेखा किया। बच्चे आपस में लड़कर पलक झपकते ही मित्र हो जाते हैं। हम अपने बचपन को खो देते हैं और मित्र बनाना कठिन हो जाता है।
सभी कलाकार अपने हृदय में बचपन को अक्षुण्ण रखते हैं और काम में इससे मदद मिलती है। अमिताभ बच्चन और शाहरुख खान का बचपन उनकी उपलब्धियों के नीचे दफन हो गया है और अपार कामयाबी ने व्यवहार में बचपना पैदा कर दिया है। बचपन और बचपने में फर्क होता है। यह समझना कठिन है कि शाहरुख यशराज चोपड़ा के कैंप के व्यक्ति हैं और यह फिल्म बड़े भाई और प्रतिद्वंद्वी बलदेवराज चोपड़ा की कंपनी ने बनाई है। उनकी संक्षिप्त अतिथि भूमिका है अत: यह मामला धन का नहीं है यह संभव है कि निर्देशक शर्मा से उनके व्यक्तिगत संबंध हों।
भूतनाथ शब्द के साथ हमारी स्मृति बिमल मित्रा के उपन्यास ‘साहब, बीवी और गुलाम’ के नायक के रूप में जुड़ी है जिसे भूतनाथ के नाम से पुकारा जाता है। बचपन में उसे इसी नाम से पुकारा जाता था और नायिका से उसकी बचपन में शादी हुई थी।
वर्षो के अंतराल बाद वे मिलते हैं परंतु असली नाम और बचपन में पुकारे जाने वाले नाम के अंतर की वजह से पहचान नहीं पाते। बहरहाल यह उस वृहद उपन्यास का छोटा सा हिस्सा है। कहानी तो एक गृहिणी की है जो पति की पसंद की खातिर शराब पीती है और जब तक पति उसके अंतस तक पहुंचे वह आदतन शराबी हो जाती है।
चोपड़ा-शर्मा की भूतनाथ की कहानी की तरह कथा पर रामगोपाल वर्मा ने भी एक फिल्म बनाई थी जिसमें रहने वाला भूत अहितकारी और हिंसक है। दरअसल फिल्मकार की व्यक्तिगत रुचि के अनुरूप ही फिल्में बनती हैं। वर्मा की विचार प्रक्रिया में बचपन और मासूमियत के लिए कोई जगह नहीं है।
उनकी मनोरंजन की परिभाषा अलग है। इसमें सही और गलत क बात नहीं है, यह व्यक्तिगत पसंद-नापसंद और रुझान की बातें हैं। मेहमूद को अपनी फिल्म के भूतों से नाच गाना कराना था और संगीतकार राहुलदेव बर्मन ने अतिथि भूमिका की थी। बहरहाल रवि और शर्मा की ‘भूतनाथ’ मजेदार फिल्म हो सकती है।